गीत/नवगीत

सीखो वृक्षों से अपनापन

सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।
मुस्काते सबके घर आँगन, लगते सबको बड़े सुहावन।।

तन मन में हैं स्फूर्ति जगाते। छाया देकर हमें लुभाते।।

प्राण वायु दें वृक्ष हमारे, फल देकर सम्मोहित सारे।।
बिना स्वार्थ के जीवन जीते, पानी भी ये कम ही पीते।
मुस्कायें सबके घर-आंगन, करो न इनसे बेगानापन।
सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।१।।

ऑक्सीजन देते जीवन भर, फिर क्यों इनका करें निरादर।।
पूरे जीवन काम हैं आते, मरकर भी वे साथ निभाते।
जन्म संग रिश्ता है जोड़ें, वे श्मशान जल नाता छोड़ें।।
मुस्कायें सबके घर- आँगन, करे न इनसे कोई पलायन।।
सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।२।।

भले स्वार्थ में हम फँस जाते, पर ये कभी नहीं उलझाते।।
मौन साधना पथ पर चलते, अपने जीवन से हैं लड़ते ।।
जिसे समझना हम कब चाहें, लगें कंटीली इनकी बाँहें।।
मुस्कायें सबके घर-आँगन, महकायें मधुबन ये कानन ।।
सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।३।।

हम सब इनको समझ न पाते, असमय काल गाल पहुँचाते।
धरती की कटान ये रोकें, इनसे ही वारिश के झोंके।।
वातावरण संतुलित रखते, हर दुख सहकर भी हैं हँसते।।
मुस्कायें सबके घर-आंँगन, लाते ये ही हरियालापन।।
सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।४।।

वृक्षों का सब आदर करिए, श्रद्धा भाव हृदय में रखिए।
अच्छा है कुछ इनसे सीखो, नहीं कभी तुम प्यारे चीखो।।
करो सदा इनका गुण गायन, नहीं समझना इनको जायन।
मुस्काते सबके घर-आँगन, लगते सबको बड़े सुहावन ।
सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।५।‌।

वृक्षों का सब आदर करिए, श्रद्धा भाव हृदय में रखिए।
अच्छा है कुछ इनसे सीखो, ताकि तुम कल में न चीखो।।
करो सदा इनका गुण गायन, कभी न समझो इनको जायन।
मुस्काते सबके घर-आंगन, लगते सबको बड़े सुहावन ।
सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।६।‌।

— सुधीर श्रीवास्तव

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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