शिक्षा एवं व्यवसाय

महंगी शिक्षा: प्रतिभा और अवसर के बीच दीवार

शिक्षा को किसी भी सभ्य समाज की रीढ़ और उज्जवल भविष्य की नींव माना जाता है। भारत में पारंपरिक रूप से शिक्षा को एक पवित्र सेवा और ज्ञान की साधना के रूप में देखा गया है। लेकिन बदलते दौर के साथ, आज शिक्षा का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। वर्तमान समय में शिक्षा का तेजी से व्यवसायीकरण हुआ है, जिसने इसे एक महंगे ‘प्रोडक्ट’ में तब्दील कर दिया है। इस बढ़ती महंगाई के बीच सबसे बड़ा नुकसान देश के मध्यमवर्गीय और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के होनहार बच्चों को हो रहा है, जिनके बड़े-बड़े सपने इस भारी-भरकम फीस के बोझ तले दबकर दम तोड़ रहे हैं।

आसमान छूती फीस और आम आदमी की बेबसी:

आज के दौर में प्ले-स्कूल से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक, शिक्षा का खर्च आम आदमी के बजट से बाहर हो चुका है। निजी स्कूलों की सालाना फीस, डोनेशन, किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर होने वाली वसूली ने अभिभावकों की कमर तोड़ दी है।

जब बात उच्च शिक्षा जैसे—मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रबंधन या सिविल सर्विसेज की कोचिंग की आती है, तो यह खर्च लाखों-करोड़ों में पहुंच जाता है। एक आम वेतनभोगी या किसान माता-पिता के लिए अपने बच्चे को किसी अच्छे निजी संस्थान में पढ़ाना एक अवास्तविक सपना जैसा लगने लगा है। नतीजा यह होता है कि प्रतिभा होने के बावजूद कई बच्चे उन पाठ्यक्रमों में दाखिला नहीं ले पाते, जिनके वे हकदार हैं।

 कोचिंग हब और ‘सपनों की मंडी’:

आज देश में कोचिंग इंस्टिट्यूट्स का एक समानांतर शिक्षा तंत्र खड़ा हो गया है। प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिए इन कोचिंग सेंटरों को अनिवार्य मान लिया गया है। लेकिन इन संस्थानों की फीस इतनी अधिक है कि यह केवल संपन्न परिवारों तक ही सीमित होकर रह गई है।

 * **समान अवसर का अभाव:** ग्रामीण और आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों के बच्चे, जो महंगी कोचिंग की फीस नहीं भर सकते, वे शुरुआत में ही इस दौड़ में पीछे छूट जाते हैं।

 * **मानसिक तनाव:** जो परिवार कर्ज लेकर या अपनी जमीन बेचकर बच्चों को इन कोचिंग हब में भेजते हैं, उन बच्चों पर सफलता का एक मानसिक दबाव बन जाता है। उम्मीदों का यह बोझ कई बार युवा मानसिक रूप से संभाल नहीं पाते।

 एजुकेशन लोन: राहत या अंतहीन कर्ज का जाल?:

महंगी उच्च शिक्षा के विकल्प के रूप में ‘शिक्षा ऋण’ को एक समाधान के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन हकीकत इसके उलट है:

 1. **गारंटर और सुरक्षा की शर्त:** बैंक से लोन लेने के लिए भी कई बार कड़े नियम और गारंटर की आवश्यकता होती है, जिसे गरीब परिवार पूरा नहीं कर पाते।

 2. **बेरोजगारी और मंदी का साया:** पढ़ाई पूरी होने के तुरंत बाद नौकरी मिलने की कोई गारंटी नहीं होती। देश में डिग्री धारक युवाओं की संख्या और उपलब्ध रोजगार के बीच एक बड़ा अंतर है।

 3. **करियर की शुरुआत में ही कर्ज का बोझ:** यदि नौकरी मिल भी जाए, तो वेतन का एक बड़ा हिस्सा लोन की ईएमआई चुकाने में चला जाता है। ऐसे में युवा अपने करियर की शुरुआत एक स्वतंत्र और रचनात्मक सोच के साथ करने के बजाय, सिर्फ कर्ज चुकाने की मशीन बनकर रह जाता है।

कौशल-आधारित शिक्षा की दरकार

इस गंभीर संकट के बीच अब समय आ गया है कि हम शिक्षा के पारंपरिक नजरिए को बदलें। केवल महंगी डिग्रियां हासिल करना ही सफलता की गारंटी नहीं है।

**भविष्य की मांग:** आज के वैश्विक परिदृश्य में केवल ‘डिग्री’ से ज्यादा ‘कौशल’ को महत्व दिया जा रहा है। यदि देश के युवाओं को व्यावहारिक और तकनीकी कौशल से लैस किया जाए, तो वे आत्मनिर्भर बन सकते हैं। डिजिटल साक्षरता, कोडिंग, डेटा एनालिसिस, व्यावहारिक विज्ञान और विभिन्न व्यावसायिक कौशल को स्कूली स्तर से ही बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि शिक्षा महंगी न होकर रोजगारपरक बने।

समाधान की दिशा में आवश्यक कदम

शिक्षा को दोबारा हर वर्ग के लिए सुलभ बनाने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है:

 * **सरकारी शिक्षा तंत्र का सुदृढ़ीकरण:** सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के बुनियादी ढांचे और शिक्षा की गुणवत्ता को इतना बेहतर बनाना होगा कि किसी भी छात्र को निजी संस्थानों का रुख न करना पड़े।

 * **फीस की अधिकतम सीमा तय होना:** सरकार और नियामक संस्थाओं को निजी शिक्षण संस्थानों और कोचिंग सेंटरों की फीस की एक तार्किक सीमा तय करनी चाहिए, ताकि शिक्षा का अंधाधुंध व्यवसायीकरण रुके।

 * **स्कॉलरशिप और वित्तीय सहायता का विस्तार:** मेधावी और जरूरतमंद छात्रों के लिए छात्रवृत्ति की योजनाओं को अधिक पारदर्शी और व्यापक बनाया जाए ताकि धन के अभाव मे किसी की पढ़ाई न छूटे।

भारत में शिक्षा को सदैव सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक उन्नति का सबसे प्रभावी साधन माना गया है। यह वह माध्यम है जो साधारण परिवारों के बच्चों को बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने का अवसर देता है। किंतु आज शिक्षा की बढ़ती लागत ने लाखों विद्यार्थियों और उनके परिवारों के लिए चिंता का विषय पैदा कर दिया है। महंगी फीस, कोचिंग संस्थानों का बढ़ता खर्च, महंगे निजी विद्यालय और उच्च शिक्षा के बढ़ते शुल्क अनेक प्रतिभाशाली छात्रों के सपनों को अधूरा छोड़ रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की फीस में लगातार वृद्धि हुई है। महानगरों और बड़े शहरों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करना मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए भी कठिन होता जा रहा है। प्रवेश शुल्क, वार्षिक शुल्क, परिवहन, पुस्तकें, यूनिफॉर्म और अन्य गतिविधियों का खर्च मिलाकर शिक्षा का कुल व्यय कई परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा निगल जाता है। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा प्राप्त करना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग संस्कृति ने इस समस्या को और गहरा कर दिया है। इंजीनियरिंग, चिकित्सा और अन्य प्रतिष्ठित परीक्षाओं की तैयारी के लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। कई परिवार अपनी बचत खर्च कर देते हैं या ऋण लेने को मजबूर हो जाते हैं। जो विद्यार्थी इन संसाधनों का खर्च नहीं उठा पाते, वे अक्सर प्रतियोगिता में पीछे रह जाते हैं, चाहे उनकी प्रतिभा कितनी ही उत्कृष्ट क्यों न हो।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थिति चिंताजनक है। निजी विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस इतनी अधिक हो गई है कि अनेक छात्र अपनी पसंद के विषयों में अध्ययन नहीं कर पाते। कुछ विद्यार्थी पढ़ाई बीच में छोड़ने को विवश हो जाते हैं, जबकि कई छात्र शिक्षा ऋण के भारी बोझ के साथ अपने करियर की शुरुआत करते हैं। इससे शिक्षा का उद्देश्य अवसर प्रदान करने के बजाय आर्थिक असमानता को बढ़ाने वाला कारक बन सकता है।

महंगी शिक्षा का प्रभाव केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रहता। जब समाज के प्रतिभाशाली युवाओं को अवसर नहीं मिलते, तो देश की मानव संसाधन क्षमता भी प्रभावित होती है। विज्ञान, अनुसंधान, साहित्य, कला और अन्य क्षेत्रों में अनेक संभावित प्रतिभाएँ केवल आर्थिक कारणों से आगे नहीं बढ़ पातीं। यह राष्ट्र के विकास के लिए भी नुकसानदायक है।

इस चुनौती का समाधान सरकार, शैक्षणिक संस्थानों और समाज के सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। सरकारी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता में सुधार, छात्रवृत्तियों का विस्तार, शिक्षा ऋण की आसान उपलब्धता और डिजिटल शिक्षा संसाधनों तक समान पहुंच जैसे कदम महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। साथ ही, शिक्षा को लाभ कमाने का माध्यम बनाने के बजाय सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में देखने की आवश्यकता है।

शिक्षा केवल एक सेवा नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण का आधार है। यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल आर्थिक रूप से संपन्न लोगों तक सीमित हो गई, तो अनेक सपने जन्म लेने से पहले ही दम तोड़ देंगे। एक समावेशी और प्रगतिशील समाज के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि हर बच्चे को उसकी आर्थिक स्थिति से परे समान अवसर मिलें। तभी शिक्षा वास्तव में सामाजिक न्याय और विकास का माध्यम बन सकेगी, और किसी भी प्रतिभाशाली छात्र का सपना केवल पैसों की कमी के कारण अधूरा नहीं रहेगा।

कोई भी देश तब तक महाशक्ति या ‘विश्वगुरु’ नहीं बन सकता, जब तक कि उसकी प्रतिभाएं पैसों की कमी के कारण कुंठित होती रहेंगी। शिक्षा का उद्देश्य समाज का उत्थान करना है, न कि मुनाफे की दुकान चलाना। जब देश के हर बच्चे को—चाहे वह अमीर हो या गरीब—समान और सस्ती शिक्षा मिलेगी, तभी ‘महंगी शिक्षा के बीच गुम होते सपने’ फिर से हकीकत का रूप ले सकेंगे। यह न केवल उन बच्चों के भविष्य के लिए जरूरी है, बल्कि पूरे राष्ट्र की प्रगति के लिए अनिवार्य है।

— डॉ. विजय गर्ग

*डॉ. विजय गर्ग

शैक्षिक स्तंभकार, मलोट

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