आख़िरी हिचकी का सफ़र
शहर के पोश इलाके में स्थित, संगमरमर से जुड़ा हुआ एक आलीशान बंगला। यह घर डॉ. जाकिर हुसैन का था, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इंसानी जानें बचाने और इस घर को बनाने में ख़र्च कर दी थी। आज इस घर के बड़े हॉल में ख़ामोशी थी, एक ऐसी ख़ामोशी जो कानों के परदे फाड़ रही थी।
डॉ. जाकिर, जिनकी उम्र अब अस्सी के लगभग थी, एक एडजेस्टेबल बेड पर लेटे थे। उनकी सांसें उखड़ रही थीं। उनकी आंखें बार-बार दरवाज़े की तरफ़ उठती थीं, जैसे किसी का इंतज़ार कर रही हों।
कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला। उनके बड़े बेटे, कमाल, जो ख़ुद एक कामयाब बिजनेस मैन थे, अंदर दाख़िल हुए। हाथ में मोबाइल था और वे किसी डील के बारे में अंग्रेजी में बात कर रहे थे। उन्होंने बेड की तरफ़ देखा, सिर हिलाया, और पानी की बोतल उठाकर बाहर चले गए। न बाप की हालत पर कोई आंसू, न कोई जज़्बाती जुमला। बस एक रस्मी कार्रवाई।
कुछ देर बाद छोटी बहू, नताशा आईं। उन्होंने डॉ. साहब की तरफ़ देखा , तक नहीं,, बल्कि पलंग के साथ लगी हुई क़ीमती चादर को दुरुस्त किया, ताकि घर में आने वाले मेहमानों के सामने कोई कमी न लगे।
डॉ. ज़ाकिर को वह पुराना वक्त याद आ गया। जब कमाल छोटा था और उसे रात को डरावना सपना आता था, तब वह अपने बाबा की छाती से लगकर ही सोता था। तब कमाल को बाबा की महक में सुकून मिलता था, और आज… आज वह महक, वह अपनापन, सब जाने कहाँ खो गया था।
फ़िर उन्हें अपनी पत्नी, मरहूम जोउया, याद आई। वह अक्सर कहा करती थीं, “जाकिर जी! यह पैसा, यह कोठी सब यहीं रह जाएगा, बच्चे ही काम आएंगे।” तब ज़ाकिर हंस दिया करते थे, उन्हें अपने बच्चों की क़ाबिलियत पर नाज़ था। लेकिन आज उन्हें समझ आ रहा था कि उन्होंने बच्चों को डॉक्टर और इंजीनियर तो बना दिया, मगर इंसान बनाना भूल गए। उन्होंने रिश्तों के ख़ून को पानी होते हुए अपनी आंखों से देखा था।
दरवाज़ा फ़िर खुला। इस बार उनकी बेटी, सारा, जो कनाडा में सेटल थी, अंदर आई। वह रो रही थी, लेकिन उसके रोने में भी एक बनावट थी। वह बार-बार कह रही थी, “ओह डेड! आपको मेरी कॉल का इंतजार नहीं करना चाहिए था, मैं टिकट करवा रही थी।”
डॉ. ज़ाकिर ने बमुश्किल अपना हाथ उठाया। वे कुछ कहना चाहते थे। शायद वे यह कहना चाहते थे कि बेटी, अब टिकट का क्या फ़ायदा? जब मुझे तुम्हारी ज़रूरत थी, जब मैं अकेलापन महसूस कर रहा था, तब तुम कहाँ थीं? तब तो तुम करियर और सेटलमेंट में व्यस्त थीं।
“पापा, आपको डॉक्टर के पास चलना चाहिए।” कमाल ने वापस आकर कहा।
डॉ. ज़ाकिर ने नफी में सिर हिलाया। वे अस्पताल की सफ़ेद चादरों और बेजान मशीनों से तंग आ चुके थे। वे अपने घर में, अपने बच्चों के बीच सुकून से मरना चाहते थे। लेकिन यहाँ बच्चे तो थे, मगर अपनापन नहीं था।
कमरे में अब डॉक्टरों की टीम आ गई थी। नर्सें ऑक्सीजन मास्क लगा रही थीं। डॉ. ज़ाकिर की नज़रें सबके चेहरों पर घूमें। कमाल अपनी प्रॉपर्टी डील में व्यस्त था, नताशा फोन पर किसी को डिनर के लिए मना कर रही थी, और सारा वीडियो कॉल पर अपने बच्चों को दिखा रही थी कि नाना की हालत कैसी है।
सब कुछ हो रहा था, बस मोहब्बत नहीं थी।
डॉ. ज़ाकिर ने आख़िरी बार छत की तरफ़ देखा। उन्हें बचपन का वह मैदान याद आया जहाँ वे अपने पिता के साथ पतंग उड़ाया करते थे। वह खुली हवा, वह हंसी, वह रिश्तों की गर्माहट… कहाँ गई वह सब?
इंसानियत की यह कैसी भूल थी? हम सब एक ही रास्ते के मुसाफिर हैं। मंजिल सबकी एक ही है—बुढ़ापा, कमजोरी, और फिर मौत। यह एक अटल सच्चाई है। फिर भी, हम इस रास्ते पर चलते हुए क्यों भूल जाते हैं कि हमने एक-दूसरे के साथ कैसा सलूक किया?
डॉ. ज़ाकिर की आंखों से दो आंसू बह निकले। ये आंसू जिस्मानी तकलीफ़ के नहीं थे, बल्कि रूह की तन्हाई के थे।
मशीनों की बीप की आवाज़ एक लंबी लकीर में बदल गई।
डॉ. ज़ाकिर हुसैन इस दुनिया से रुख़सत हो गए। वह दुनिया जहाँ रिश्ते सिर्फ़ कागज़ के टुकड़ों और बैंक बैलेंस तक सीमित रह गया था,
मातम कदा बनी इस कोठी में अब ताज़ियत (शोक व्यक्त) के लिए आनेवालों का तांता बंधा हुआ था। कमाल सफ़ेद कुर्ते-पायजामे में मलबूस (सजे), आंसू पोंछने का नाटक करते हुए आने वाले मेहमानों से हाथ मिला रहा था और साथ ही साथ फ़ोन पर तदफ़ीन (अंतिम संस्कार) के इंतज़ाम और जायदाद की तक़सीम (बंटवारा) के वकील से व्हाट्सएप चैट भी जारी रखे हुए था। सारा फूट-फूट कर रो रही थी क्योंकि उसका पति कनाडा से अगली फ्लाइट पकड़ने में देरी का शिकार हो रहा था और उसे अपनी वापसी की जल्दी थी।
तीन दिन बाद, जब चालीसवां और फूल की रस्म की तमाम दिखावा नुमा रस्में खत्म हो गईं, तो घर बिल्कुल सुनसान हो गया। शाम के साए गहरे हो रहे थे कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। कमाल ने दरवाज़ा खोला तो सामने एक अधेड़ उम्र शख्स खड़ा था, जिसके हाथ में एक पुराना, जीर्ण-शीर्ण सा ब्रीफ़केस और कुछ कागज़ात थे।
“आप… आप कौन हैं?” कमाल ने बेज़ारी से पूछा।
“मैं… मैं उस अस्पताल का मैनेजर हूँ जहाँ तुम्हारे वालिद (पिता) पिछले चालीस साल से मुफ़्त इलाज कैंप चलाते रहे हैं और गरीबों की दवाओं का ख़र्च खुद उठाते थे,” उस शख़्स ने ग़मगीन लहज़े में कहा, और फ़िर ब्रीफ़केस खोलकर चंद फाइलें और एक वसीयतनामा कमाल के हाथ में थमा दिया।
कमाल ने हैरानी और ग़ुस्से से कागज़ों पर नज़र डाली। उसमें लिखा था
“मेरे प्यारे बच्चों! तुमने ज़िंदगी भर दौलत को ही सब कुछ माना, इस कोठी को ही अपनीख्वाबों की जन्नत समझा। आज मैं जा रहा हूँ, और जाते-जाते तुम्हें बताता जाऊँ कि जिस बंगले और बैंक बैलेंस पर तुम्हें नाज है, वह सब मैंने उन ग़रीबों, यतीमों और बेसहारा लोगों के नाम वक़्फ़ (दान/समर्पित) कर दिया है जिनकी आहें सुनकर मेरा ज़मीर ज़िंदा रहता है। तुम्हारे हिस्से में सिर्फ़ ये खाली दीवारें और वे बेजान यादें आएंगी जो तुमने मुझे मेरे आख़िरी वक़्त में दीं। ख़ुदा तुम्हें इंसान बनाए।”
कागज़ कमाल के कांपते हुए हाथों से छूटकर फ़र्श पर गिर गया। नताशा जो पास ही खड़ी थी, यह सुनकर चीख पड़ी। वे भागकर तिजोरी वाले कमरे में गए और अलमारी खोली तो अंदर से पैसों और जेवरात के नाम पर सिर्फ़ कुछ पुरानी डायरियां और मरीजों के दुआए ख़त (पत्र) निकले।
अब वे इस करोड़ों रुपए की संगमरमर की आलीशान कोठी में अकेले खड़े थे,बाहर दुनिया की नज़र में वे एक अमीर डॉक्टर के वारिस थे, लेकिन अंदर से वे नंगे, कंगाल और इस समाज के सबसे बड़े यतीम (अनाथ) बन चुके थे। मौत के इस भयानक और इबरतनाक सच ने उन्हें एक ही लम्हे (पल) में बता दिया था कि अपनों को तड़पाकर और रिश्तों का खून करके जमा की गई दौलत इंसान को सिर्फ़ क़ब्र के गड्ढे तक तो ले जा सकती है, मगर सुकून की एक सांस और इज़्ज़त की मौत नहीं ख़रीद सकती।
हवा का एक तेज झोंका खिड़की के शीशों से टकराया, जैसे डॉ. जाकिर की रूह उनकी इस बेबसी पर आख़िरी बार मुस्कुरा रही हो।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह ‘सहज’
