कहानी – इकलौती बहु
दूर-दूर तक जंगलों, पहाड़ों चट्टानो के बीच एक छोटा सा घर, जिसमें सिर्फ तीन लोगों का बसेरा था, लेकिन सपनों की इतनी बड़ी महल वहां वाश करती इसका अंदाजा लगाना भी इतना आसान नहीं था !
गुरप्रीत जो सरकारी अस्पताल में एक मामूली सी नर्स थी लेकिन सेवा भावना उसमे कूट-कूट कर भरी हुई थी। वही परमिंदर फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में नौकरी करते थे । विवाह के शुरुआती दिनों में तो गुरप्रीत को एडजस्ट करने में बहुत प्रॉब्लम हुआ लेकिन फिर एक प्यारी सी गुड़िया ने घर के पूरा माहौल बदल दिया। पहले बचपना फिर 20 किलोमीटर दूर विद्यालय और फिर अपना अस्पताल उसके बाद वह बिल्कुल वक्त ना निकाल पाती, लेकिन हां परमिंदर जी छुट्टी मिलते ही घूमने जरूर निकल जाते । वहीं रविवार को तो सपरिवार गुरूद्वारा जाने से कभी ना चूकते। गुड़िया भी वहां के माहौल में बिल्कुल रम जाती। श्रद्धा भावना से ओत -प्रोत वह परमिंदर जी के सामने सवालों के ढेर खड़ा कर देती।
अगले सप्ताह गुड़िया का जन्मदिन था। हर बार की तरह दोनो इस बार भी अपनी इकलौती बेटी की जन्मदिन के लिए जोर-जोर से तैयारी में लगे हुए थे। गुड़िया ने बात काटते हुए कहा ‘ पापा क्यों ना इस बार मेरा जन्मदिन कुछ अलग रूप में मनाया जाए।
मतलब! कैसे ?? दोनों ने आश्चर्य से पूछा !
क्यों न इस बार मेरा जन्मदिन हम गुरुद्वारे में ही मना ले। वैसे भी रविवार का दिन है।गुड़िया ने अपना पक्ष रखा।
आईडिया तो बुरा नहीं है वैसे, लेकिन वह तो दिन में फिर रात को…. परमिंदर ने उसकी इच्छा जाननी चाही।
रात को हम तीनों जाकर रेस्टो में डिनर कर लेंगे बस हो गया, और क्या….! गुड़िया ने अपने मन की बात बताइ।
वाह , मेरी बेटी अब बड़ी हो गई है। परमिंदर ने मुस्कुराते हुए कहा।
हां पापा, इससे जरूरतमंदों को कम से कम एक टाइम भोजन भी मिल जाएगा । गुड़िया ने समझाते हुए कहा ।
और मेरी बेटी को दुआएं भी… पिता ने जोर से खिलखिला कर कहा ।
गुरु के दर्शन के बाद करीब हजारों लोगों ने लंगर किया, जिससे गुड़िया सहित सपरिवार को भी बहुत खुशी हुई । अब यह शिलषिला प्रत्येक वर्ष चलता रहा। देखते – देखते उसका विवाह भी संपन्न हो गया। सौभाग्य वश ,वह वहां भी इकलौती बहु थी । ऊपर वाले की कृपा से यहा भी कभी किसी प्रकार की कोई कमी महसूस नहीं हुई। सास बहू में इतनी अच्छी समझ देख आस- पास के लोगो मे कही ईर्ष्या भाव तो कहीं व्यंग्य का विषय हो जाता ।
अरे बहु , जरा एक कप चाय पिला दो , गला सूखा जा रहा है। पडोस की काकी ने प्रातः काल कुछ व्यंग्य करते हुए कहा।
बहु तो घर पर नहीं है, बैठिए मै ही बना देती हू। सासू मां ने बड़ी ही विनम्रता से कहा ।
कहां गई, इतनी सुबह-सुबह… काकी ने जानने की इच्छा जताई ।
उसे कुछ काम था इसलिए सुबह ही निकल गई ।
वह बातों ही बातों में थोड़ा कंट्रोल कर ले अपनी बहू को, वरन कुछ दिनों बाद तेरे सिर पर बैठकर नाचेगी । काकी ने कुछ व्यंग्य करते हुए कहा।
नाचेगी तो नचवा लूंगी, आखिर एक ही तो बहू है। सासू मां ने पूरे रोष के स्वर मे कहा । यह सुनते ही वह तिल मिला उठी और अपने घर को निकल गई ।
गुड़िया के घर आते ही सासू मां ने सारी बात बताइ । उसकी आंखें भर भरा पड़ी । मौनता से सिर्फ यही निकला —मां ….
अब गुड़िया का सासु के प्रति सम्मान ओर भी बढ़ गया। अब वह कहीं भी जाती तो अपने साथ उन्हें भी साथ ले जाती। यह देख टोले – मोहल्ले में और भी बातें बनने लगी, लोग कुछ ना कुछ व्यंग कर ही देते।
आज फाटक पर खड़ी काकी को देख गुड़िया ने उजा कर पहले बात करने की कोशिश की।
कहां से आ रही हो, काकी ने झट से सासू मां की तरफ इशारा करते हुए पूछा ।
अरे नहीं, वह बहू अपने साथ मुझे भी ले गई थी इसीलिए अब आ रही … सासु मां ने कहा।
अच्छा है, बडी सौभाग्यशाली है जो तुझे बहु अपने साथ तो ले जाती है। मेरी बहू तो साथ ले जाना छोड़ ही दे, लोगों के सामने मुझसे बात तक नही करती।
मेरी बहू तो लाखों में एक है सासु मां ने मुस्कुराते हुए कहा। लेकिन हां इसमे तेरी गलती है । पहले तो एक अनजानी लड़की को बेटी बनाना पड़ता है उसके बाद कही …। यह सुनते हैं गुड़िया और सासू मां का चेहरा खिलखिला उठी.
— डोली शाह
