कविता

धूप छांव

सूरज को रास्ता नहीं मिल रहा 

मेरे घर का 

चारों ओर से घिर गया मेरा घर 

ऊँची ऊँची ईमारतों से 

चाँद कभी झाँक लेता था 

आधी रात मेरी खुली खिड़की से 

रास्ता उसका भी बंद हो गया 

मेरे घर तक़ आने का 

अब न धूप आ रही 

न चांदनी चाँद की

बंद कोठरी में सिमट रह गयी है जिंदगी 

अब इस सब के बिना 

*ब्रजेश गुप्ता

मैं भारतीय स्टेट बैंक ,आगरा के प्रशासनिक कार्यालय से प्रबंधक के रूप में 2015 में रिटायर्ड हुआ हूं वर्तमान में पुष्पांजलि गार्डेनिया, सिकंदरा में रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा है कुछ माह से मैं अपने विचारों का संकलन कर रहा हूं M- 9917474020

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