जब तलक थे अर्श पर
छोड़ बैठी हैं मुझे दुनिया, मेरे ग़मख़्वार भी।
हो गए हैं आजकल मुझसे सभी बेज़ार भी॥
दर्द की इस राह में मिलता नहीं हमदम कोई,
कर गए तन्हा मुझे मेरे सभी आसार भी॥
वक्त ने ऐसी दिखाई ज़िंदगी की सख्तियाँ,
हो गए पत्थर से अब रिश्तों के वो किरदार भी॥
जब तलक थे अर्श पर, मिलता रहा सत्कार भी।
वक्त बदला तो हुआ हमसे जुदा परिवार भी॥
जब ज़रूरत थी मुझे, सबने किनारा कर लिया,
दूर से करते रहे बस प्यार का इज़हार भी॥
मैंने जिसको मान अपना उम्र भर अपना लिया,
दे गया वो ही मुझे नफ़रत का यह उपहार भी॥
हौसलों की रोशनी लेकिन नहीं कम हो सकी,
हार मानी है कहाँ तकदीर ने हर बार भी॥
ऐ ‘मृदुल’ विश्वास रख तू कर्म पर, भगवान पर,
एक दिन होंगे तेरे सपने सभी साकार भी॥
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
