कविता

बाबा

धीरे-धीरे अनुभव से सिखलाए जीने का तौर तरीका,
नन्हें सपनों में रंग भरने को दे पिता हाथों में तूलिका,
बेटा जहॉं राज दुलारा और बिटिया कहलाती मल्लिका,
थोड़ा डर ज्यादा अपनापन बाबा बिन लगता घर फीका ।

अपनों की हॅंसी-खुशी के ही खातिर पिता पसीना बहाएं,
बाहर से सजाकर मुस्कान रोज ही भीतर चिंताएं दबाएं,
घर की जिम्मेदारियों को कंधों पर उम्र भर पिता उठाएं,
बच्चों की फरमाइशों में खुद के ख़्वाब जो भूल जाएं ।

हमें खुद से बेहतर बनाने को दिन रात करे जो परिश्रम,
अनबन हमारी सहकर भी नहीं कभी करें जो प्यार कम,
कभी सख्त रवैया भी अपनाएं पर ऑंखे रहे सदा नम,
दुनिया से कदम से कदम मिला चलना सिखाएं हरदम ।

ऊॅंगली थाम कर बाबा की हर मुश्किल छोटी हो जाती,
बस बाबा के एक संग होने से हिम्मत दुगनी हो जाती,
अंधेरों में भी छोटी सी दुनिया चमचम रोशन हो जाती,
सिर पर हाथ रख देने भर से किस्मत जगमग हो जाती ।

सीने में कितना दर्द छिपा क्या तुम्हें कुछ भी हैं मालूम,
पिता की रोक-टोक से मत हो जाना जरा भी गुमसुम,
छोटी-मोटी डांट डपट को सीने से चिपकाना मत तुम,
पिता का दाहिना हाथ बन मानना दिल से हर हुकुम ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु