सामाजिक

फादर्स डे (21 जून) पर विशेष – जीवन का आधार हैं : पिता

वर्तमान में पिताओं में जो परिवर्तन परिलक्षित हुआ हैं। वह एक साहसिक और खुागवार पहलू है। साहसिक उस परिदृश्य को देखकर कहना होगा कि पहले के पिता जो विोष रूप से अपने कार्य में लीन और पूरे परिवार के सदस्यों पर रौब जमाने वाले होते थे। उनसे बच्चे बातें करने से डरते थे। यदि यह भी मैं कहूँ कि वे बात भी नहीं करते थे, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। पिता से बात करना यानि माँ के माध्यम से बात होती थी। आधुनिक संदर्भों में पापा के नाम का खौफ नहीं रह गया है। अब पापा सकारात्मक सोच के साथ बच्चों के एकदम करीब आ गये है। उनके मित्र के रूप में। यहीं है खुशगवार परिवर्तन जो इस आधुनिक युग में देखने में आया है। जिस पर हम गर्व कर सकते हैं।

वातावरण का असर-

पूर्व की पीढ़ी के पिता की आलोचना करना आसान है। परंतु उस जमाने का वातावरण आज जितना खुलापन लिए हुए नहीं था। सकारात्मक दृष्टिकोण से सोचे तो ऐसी परिस्थितियाँ भी नहीं थी। परिवार बहुत बडे़ हुआ करते थे। ऐसे में किस पर ध्यान दें और किस पर नहीं, समझ में नहीं आता था। यह भी एक कारण हो सकता है। वर्तमान में यह स्थितियाँ उलट है। आज की युवा पीढी भविष्य की संभावनाओं का पहले ही विचार कर लेती है, फिर वर्तमान में निर्णय करती हैं न्यू जनरेान का ध्यान इस ओर रहता है कि बच्चे हो और उनका पालन-पोषण बहुत ही अच्छे तरीके से हो। सिर्फ दो बच्चों पर ही ध्यान केन्द्रित वे करते है। वरन! कई परिवार तो इससे भी आगे की सोचने लगे है। हांलाकि उनकी वो सोच किस दिाा में जाएगी यह कहना मुकिल है। लेकिन वे अब एक ही बच्चे में खुा रहने का सोचती है। इसलिये समय और वातावरण दोनों का ही असर देखने को मिलता है।

मित्र की भूमिका में-

वर्तमान में पिता अपने बच्चों के लाडले पापा है। साथ ही वे मित्र की भी भूमिका में है। उन्हें किसी प्रकार का संकोच नहीं होता। वे अपने पापा से खुले तौर पर बातचीत करते हैं। अपनी आवयकताओं की पूर्ति के लिए वे आज माँ को आगे नहीं करते। वरन! स्वयं उत्सुक रहते है, अपने पापा से बातें करने में। पहले बच्चों के लालन-पालन का संपूर्ण जिम्मा अकेले माँ के कंधों पर होता था। आज वह हॉफ हो गया है। पापा को अपने बच्चे की नैपी बदलने में भी कोई संकोच नहीं होता। इसका निर्वहन वे पत्नी की उपस्थिति और अनुपस्थिति में भी बखूबी निभाने को उत्सुक रहते हैं। इसमें होमवर्क का पार्ट भी सम्मिलित है। इस व्यापक परिवर्तन का आधार आर्थिक मोर्चे पर पत्नी द्वारा कामकाजी महिला के रूप में भी सामने आया है। इससे पिता का आर्थिक बोझ तो कम हुआ ही है। साथ ही उनके घरेलू पदार्पण ने वात्सल्य का एक नया द्वार खोल दिया है। एक पिता के पास आज अपने बच्चों के लिए समय है। यानि पिता मित्र की भी भूमिका में आ गये है।

पिता होने का सुख-

पिता होने के सुख की अनुभूति इन्हीं ाब्दों से होती है कि जब पिता कह उठते है-‘यकिन, नहीं होता कि यह हमारा बच्चा है।‘ इसके गूढ़ अर्थ में जाये तो वे पिता बनकर बहुत ही आनंदित है। वे आन्दोलित है नन्हें-2 हाथ-पैर, गोल-मटोल चेहरा देखकर। उनके पास इस आनंद को बाँटने के लिए शब्द भले ही न हो, परंतु वे उसे अपने हाथों में लेकर, छूकर अपनत्व के सागर में डुबकियां लगाने को आतुर रहते हैं, पिता होने का सुख उनके मनोभावों को व्यक्त करता हैं। आज वर्तमान में पापा मन ही मन नहीं अपितु अपने प्यार को व्यक्त कर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं।

संरक्षणात्मक कवच है-

एक पिता के होने और न होने को खूब परिलक्षित किया जा सकता है। इस संबंध में बॉलीवुड के एक सुपर सितारा नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताते है-‘मैं जब पन्द्रह वर्ष का था, तभी मेरे पिता नहीं रहें। हांलाकि इतनी कम उम्र में यह बर्दाश्त कर पाना बहुत मुकिल था। परंतु मैं रोया नहीं इतना अवश्य लगा कि मैं समय से पूर्व ही बडा हो गया हूँ। कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ भी बढ गया था। मैंने वो सब किया जो वे स्वयं इस दुनिया में रहते हुए करते। परंतु उनका साया तो होना ही चाहिए था। हम भले ही जिन्दगी की लडाई लडते रहें। लेकिन पिता की कमी को पूरा करना नामुमकिन हैं क्योंकि पिता शब्द ही अपने आप में एक संरक्षणात्मक कवच हैं।‘

जब कोई किसी से पूछता है-“तुम किसके बेटे हो या बेटी हो। और इससे आगे भी कि तुम्हारे पिताजी, का नाम क्या है।“ इन वाक्यों में ही उनके अस्तित्व का रहस्य परिलक्षित होता है। सम्मान का दृष्टिकोण यहीं से प्रारंभ होता हैं एक पहचान, जो यही से बनना प्रारंभ होती हैं इसमें यह बात भी गौर करने वाली हैं कि किसी भी आवेदन-पत्र या दस्तावेज में पिता के नाम का उल्लेख आवयक होता हैं यह सही है कि वर्तमान में माँ का नाम भी अंकित किया जाने लगा है। परंतु पिता के नाम की महत्ता अभी भी बरकरार हैं। पिता, पूजनीय है इसलिए नहीं कि वे जन्मदाता है अपितु इसलिए कि वे अपने बच्चों को कठिनाईयों से संघर्ष करना सिखाते हैं वहीं स्वाभिमान से जीने का पाठ भी पढाते हैं पितृ दिवस यानि फादर्स डे भले ही पश्चिम की परम्परा क्यों न हो परंतु अनुकरणीय है। पिता के सम्मान में एक नए दिन की शुरूआत के रूप में देखा जाना चाहिये।

— संजय एम तराणेकर

संजय एम. तराणेकर

जन्म वर्ष 1968 कवि, स्वतंत्र लेखक व टिप्पणीकार। शिक्षा स्नातक एवं गायन में 1986 में विद् किया होकर केन्द्रीय सचिवालय हिन्दी परिषद् द्वारा हिन्दी आषुलिपि प्रतियोगिता में वर्ष 1992 प्रषस्ति-पत्र प्राप्त। विशेष रूचि-बॉलीवुड फिल्में एवं संगीत, पुस्तक समीक्षा एवं राजनीति। मैं मूलतः मध्य प्रदेश के स्वच्छता में हैट्रिक लगा चुके एवं चार बार नंबर वन बनें स्मार्ट सिटी इन्दौर का निवासी हूँ। 1990 के दशक में लेखन में मन रमने लगा और ‘पत्र संपादक के नाम‘ से अपनी प्रारंभिक शुरूआत की। लेखकीय सुकून कितना संतोष देता है, इसकी बात ही कुछ और है। युवा होने पर फिल्मी कलाकारों की तरफ झुकाव ने फिल्मों पर आलेख लिखने की प्रेरणा दी। इसमें मेरी रूचि भी थी। विशेषकर पुराने फिल्मी कलाकारों के जीवन से सम्बंधित आलेखों पर अधिक ध्यान आकर्षित रहा। बावजूद इसके लघु कथा व कविता (बतौर युवा कवि आकाशवाणी इन्दौर में कविता पाठ के भी कई अवसर प्राप्त हुए है।) के अलावा सामयिक, सामाजिक एवं राजनैतिक विषयों पर समय-समय पर अपनी लेखनी को आयाम देने के प्रयास आज भी अनवरत हैं। अब तक विभिन्न समाचार-पत्रों में मुख्य रूप से बॉलीवुड/सिनेमा की साप्ताहिक मेगजीनों में आलेखों एवं पुस्तक समीक्षाओं का प्रकाशन हो चुका है। इनमें ‘लोकमत समाचार-आकर्षण व शो टाईम, राजस्थान पत्रिका-बॉलीवुड, पंजाब केसरी व दैनिक ट्रिब्यून के मनोरंजन, राज एक्सप्रेस-राज सिनेमा, द सी एक्सप्रेस-सी सिनेमा, हरि-भूमि के रंगारंग व रविवार भारती, चौथा संसार के बॉलीवुड, बीपीएन टाईम्स के शो बीपीएन व तरंग, लोकदशा के पर्दा-बेपर्दा व विविधा, नव-भारत एवं स्वतंत्र भारत के अलावा कई स्थानीय समाचार-पत्रों में भी आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। वहीं ‘स्वतंत्र वार्ता एवं डेली हिन्दी मिलाप‘ में कई वर्षो तक नियमित रूप से लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 31, संजय नगर, इन्दौर-452011 मध्य प्रदेश, (वार्ता+वाट्स एप) 98260.25986 ईमेलः s.taranekar@rediffmail.com, Facebook – https://www.facebook.com/Taranekar9

Leave a Reply