लोकतांत्रिक मूल्य और राजनीतिक ईमानदारी
4 मई 2026 को विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद से पिछले कुछ हफ़्तों में जो कुछ दिखा है, उससे साफ़ है कि बीजेपी चुने हुए प्रतिनिधियों को लालच देकर, डरा-धमकाकर, खरीदकर या ब्लैकमेल करके अपने समर्थन में लाने और संसद में एनडीए की संख्या बढ़ाने के अभियान में जुट गई है।जो लोग आदर्शवादी हैं, उन्हें यह लोकतंत्र का मज़ाक और मतदाताओं का अपमान लग सकता है, क्योंकि 2024 में जनता ने बीजेपी को अपना एजेंडा आगे बढ़ाने का जनादेश नहीं दिया था। सांसदों से दल-बदल करवाना बहु-दलीय व्यवस्था और जनता के साथ एक क्रूर मज़ाक और अनैतिक व स्वार्थी काम है। लोगों को शायद यह भ्रम हो कि उन्होंने किसी खास विचारधारा, कार्यक्रम और नीतियों के आधार पर अपने प्रतिनिधि चुने हैं। लेकिन बीजेपी का उन्हें यही संदेश है कि उसे असल में जनता के जनादेश की कोई परवाह नहीं है।सांसदों पर आजमाया जा रहा लालच और/या दबाव का यह सिलसिला तृणमूल कांग्रेस या शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के सांसदों तक ही सीमित रहने की संभावना नहीं है।देश को विपक्ष से पूरी तरह मुक्त करने का बीजेपी का राजनीतिक मिशन 2016 में नोटबंदी और उसके ठीक अगले साल शुरू की गई इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम के साथ शुरू हुआ। ये दोनों ही विपक्ष को बैकफुट पर लाने की सोची-समझी और चालाकी भरी रणनीतियां थीं। ऐसे कई कारण और सबूत हैं जिनसे यह माना जा सकता है कि बीजेपी को नोटबंदी के बारे में पहले से पता था और उसने अपने फंड को सुरक्षित रखने की तैयारी पहले ही कर ली थी, जबकि विपक्ष को इसकी भनक तक नहीं लगी और उसे इस उथल-पुथल का खामियाजा भुगतना पड़ा।इसी तरह, इलेक्टोरल बॉन्ड रिश्वत को एक जगह इकट्ठा करने का ज़रिया थे, जिसके तहत दान देने वाले लोग पॉलिसी में बदलाव, फ़ायदे और लेन-देन के बदले बीजेपी के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदते थे। इसने बीजेपी को संरक्षण का एक ढांचा बनाने और अपने संसाधनों को अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ाने में मदद की। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद भी यह सिस्टम अनौपचारिक रूप से जारी है। भारत के चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों द्वारा सौंपे गए ताज़ा आंकड़ों से पता चलता है कि ₹10,000 करोड़ के चंदे के साथ बीजेपी, सभी अन्य राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को मिलाकर भी उनसे कहीं ज़्यादा अमीर है।इससे पता चलता है कि बीजेपी चुनावों में बेहिसाब पैसा खर्च करने — जिस पर कोई कानूनी सीमा नहीं है — और देश के हर ज़िले में आलीशान दफ़्तर बनाने में कैसे कामयाब रही है। पार्टी ने वह कर दिखाया है जो पुरानी पार्टियां नहीं कर पाईं। पार्टी ने सीबीआई, ईडी और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट जैसी सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने और असहमति जताने वालों की आवाज़ दबाने के लिए भी किया है। जहां तक मुख्यधारा की मीडिया की बात है, जो कमाई के लिए तरह सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर है, तो उनके लिए सरकार से सवाल पूछना अब कोई विकल्प नहीं रह गया है।इसी मुश्किल हालात के बीच, बीजेपी ने चुनावी अनिश्चितताओं के जोखिम के बिना संसद में अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश शुरू की है। आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में शामिल होने – जिसे राज्यसभा के चेयरमैन सी पी राधाकृष्णन द्वारा विलय के तौर पर मान्यता और मंज़ूरी दिए जाने से राज्यसभा में एनडीए की ताकत बढ़कर 148 हो गई है। राज्यसभा चुनावों के मौजूदा दौर में एनडीए को और भी कई सीटें मिलने की संभावना है।बीजेपी पहले ही मध्य प्रदेश से तीन सीटें जीत चुकी है और उसे झारखंड और मिजोरम से तीन और सीटें हासिल होने की उम्मीद है। तृणमूल कांग्रेस के तीन सांसदों के राज्यसभा से इस्तीफा देने के बाद, एनडीए इस साल के अंत में होने वाले उपचुनावों के बाद पश्चिम बंगाल से सभी तीन सीटें सुरक्षित करने के लिए तैयार है, जिससे उसकी संख्या 154 हो जाएगी, 163 सीटों में से नौ कम और उच्च सदन में दो-तिहाई बहुमत होगा।नवंबर तक एनडीए की राज्यसभा में ताकत कम हो सकती है, क्योंकि उत्तर प्रदेश से 10 सांसद रिटायर हो रहे हैं। इससे समाजवादी पार्टी को राज्य विधानसभा में अपनी बेहतर संख्या के कारण कुछ सीटें मिल सकती हैं। लेकिन क्या होगा अगर बीजेपी अगले दौर से पहले उसके कुछ सांसदों को अपनी तरफ खींचने में कामयाब हो जाती है? आठ सांसदों वाली डीएमके, तीन सांसदों वाली आप, सात और छह सीटों वाली वाईएसआरसीपी और बीजेडी, और एमडीएमके जैसी एक-दो छोटी पार्टियां राज्यसभा में किसी भी तरफ जा सकती हैं।शिवसेना (यूबीटी) की पूर्व राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने पार्टी छोड़ने वाले नेताओं और कथित ऑपरेशन टाइगर को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जो नेता किसी राजनीतिक दल के नाम और चुनाव चिह्न पर जीतकर संसद या विधानसभा पहुंचते हैं, उनके लिए पार्टी छोड़ने के बाद भी उस सीट पर बने रहना उचित नहीं है।प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि यदि किसी नेता को अपनी पार्टी से असंतोष है तो उसे जनता के बीच जाकर अपने दम पर चुनाव लड़ना चाहिए और नया जनादेश प्राप्त करना चाहिए। ऐसे राजनीतिक घटनाक्रमों को ऑपरेशन टाइगर कहना गलत है। इसे ऑपरेशन गद्दारी कहा जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि इस मामले में उनकी पार्टी ने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष संविधान का हवाला देते हुए अपना पक्ष रखा है। यह मामला अभी भी न्यायिक प्रक्रिया में लंबित है और पार्टी कानूनी लड़ाई लड़ रही है।शिवसेना (यूबीटी) सांसदों को तोड़ने के लिए 15-15 करोड़ रुपए का ऑफर दिए जाने संबंधी संजय राउत के दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि यदि कोई वरिष्ठ नेता किसी संभावित राजनीतिक घटनाक्रम की जानकारी होने का दावा करता है, तो उसके पीछे कुछ न कुछ आधार अवश्य हो सकता है। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों से संपर्क साधे जाने और संभावित दलबदल की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। ऐसे में इस तरह की चर्चाओं पर उन्हें कोई हैरानी नहीं होगी।प्रियंका चतुर्वेदी ने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र की राजनीति में पहले भी खरीद-फरोख्त और राजनीतिक सौदेबाजी के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे घटनाक्रम लोकतांत्रिक मूल्यों और राजनीतिक ईमानदारी पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के नेता सौगत रॉय ने पार्टी से अलग हुए गुट को मंगलवार को गद्दारों का समूह करार दिया।उन्होंने कहा कि पार्टी से अलग हुए सांसद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के इशारे पर काम कर रहे हैं। तृणमूल के बागी गुट द्वारा लोकसभा में पार्टी के दो-तिहाई सांसदों का समर्थन होने का दावा और नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय की योजना की घोषणा किये जाने के बाद रॉय ने यह टिप्पणी की।रॉय ने कहा, दो टीम हैं, एक तृणमूल की टीम और दूसरी गद्दारों की टीम। वरिष्ठ सांसद ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं, पार्टी का चुनाव चिह्न दो फूल है और पार्टी विपक्षी इंडिया गठबंधन का हिस्सा है।उन्होंने आरोप लगाया कि गद्दारों की टीम एनडीए के साथ खड़ी है।रॉय ने कहा, तृणमूल की टीम का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं। गद्दारों की टीम का नेतृत्व नरेन्द्र मोदी करते हैं। प्रिय पाठकों बीजेपी ने 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनाने के बाद से देश की राजनीति में अपनी पकड़ लगातार मजबूत की है।इस दौरान पार्टी ने न सिर्फ चुनावी जीत हासिल की, बल्कि दूसरी पार्टियों के नेताओं, विधायकों और सांसदों को तोड़कर अपने साथ मिलाने की रणनीति को भी बखूबी अंजाम दिया।इस रणनीति को राजनीतिक गलियारों में ऑपरेशन लोटस के नाम से जाना जाता है।बीते 12 सालों में कितने विपक्षी दलों के सांसद और विधायकों ने बीजेपी जॉइन की। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 में देशभर में बीजेपी के कुल 1,035 विधायक थे।यह संख्या लगातार बढ़ती गई और 2025 तक आते-आते यह 1,654 हो गई।यानी एक दशक में बीजेपी के विधायकों की संख्या में करीब 600 का इजाफा हुआ है।एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर ) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 से 2021 के बीच हुए चुनावों में 500 सांसदों और विधायकों ने दल-बदल किया। इनमें से सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी को हुआ।रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान 173 सांसद और विधायक दूसरी पार्टियों को छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए।वहीं, बीजेपी से सिर्फ 33 सांसद-विधायक ही अलग हुए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2022 से 2026 के बीच दल-बदल का जो आंकड़ा सबसे ज्यादा चर्चा में रहा, वह 168 सांसदों और विधायकों का है। इनमें से 82 फीसदी यानी करीब 138 लोग बीजेपी में शामिल हुए।इसका मतलब है कि हर चार में से तीन से ज्यादा दलबदलू नेताओं की मंजिल बीजेपी ही थी। एडीआर की रिपोर्ट साफ बताती है कि दल-बदल का सबसे बड़ा खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा।2014 से 2021 के बीच 177 सांसदों और विधायकों ने कांग्रेस छोड़ी। इसके अलावा 222 उम्मीदवारों ने भी कांग्रेस का दामन छोड़ा। दूसरे नंबर पर बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी ) रही, जिसके 20 सांसद-विधायक और 153 उम्मीदवारों ने पार्टी छोड़ी. समाजवादी पार्टी (एसपी ) ने 18 सांसद-विधायक खोए, जबकि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी ) से 26 सांसद-विधायक अलग हुए थे। 2022 से 2026 के दौर में सबसे बड़ा झटका कांग्रेस को लगा।मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि बीजेपी में शामिल होने वालों में से 57 फीसदी पहले कांग्रेस में थे।यानी बीजेपी में गए 138 नेताओं में से करीब 79 कांग्रेस छोड़कर आए थे। हालांकि, यह आंकड़ा केवल एक रिपोर्ट का हिस्सा है।पूरी तस्वीर और भी बड़ी है।बीजेपी डॉट ओआरजी के मुताबिक, 2026 तक आते-आते देशभर में बीजेपी के विधायकों की कुल संख्या 1,654 हो गई, जो 2019 में 1,364 थी. यानी, सिर्फ 7 सालों में बीजेपी को करीब 290 विधायकों का फायदा हुआ, जिसमें 2022-2026 का दौर भी शामिल है। मीडिया रिपोर्ट्स और विपक्षी दलों के मुताबिक, ऑपरेशन लोटस के जरिए बीजेपी अब तक 6 राज्यों में सरकारें गिरा चुकी है। 2022 से 2026 के बीच का दौर बीजेपी के लिए दल-बदल के मामले में बेहद फायदेमंद रहा। कांग्रेस इस दौर की सबसे बड़ी हारने वाली पार्टी रही, जबकि शिवसेना, टीएमसी और आप जैसी पार्टियों को भी बड़े झटके लगे। ऑपरेशन लोटस के तहत बीजेपी ने न सिर्फ विपक्षी पार्टियों को कमजोर किया, बल्कि अपनी संख्या बल को भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया।इस सबके बावजूद लोकसभा में एनडीए अभी भी 363 के जादुई आंकड़े से काफी दूर है, लेकिन विपक्ष को सावधान रहना होगा।
— जुनैद मलिक अत्तारी

राजनैतिक जोड़तोड़ करना कोई अपराध नहीं है. यदि कोई पार्टी अपने एमपी एमएलए को साध के नहीं रख पाती, तो दूसरे दलों का क्या दोष. यदि बीजेपी ने जोड़-तोड़ करके सरकारें गिराईं और बनाई हैं, तो क्या गलत हुआ?
आपको तो यह बताना चाहिए कि मोदी जी ने धारा ३५६ का दुरूपयोग करके कितनी सरकारें गिरायी हैं और उनसे पहले की कांग्रेस सरकारों ने कितनी सरकारें गिरायी थीं.
एक तरफ़ा लेख लिखने से लोग भ्रमित हो सकते हैं, हम नहीं।