सामाजिक

हत्यायें कब रूकेगी

अरे नंदू! आखिर तूने मार ही डाला तीन बेटियों को। तुम्हारा कलेजा नहीं कांपा। इन बेचारी ने क्या बिगाड़ा था। तू इतना निर्दयी हो गया। कितनी सुघड़-सुघड़ लड़कियां थी। बेदर्दी इतना हो गया। इनके मासूम चेहरे को देखकर तेरा हथियार रूका नहीं। मारने से पहले सोंच लेता।

अब तू किस बेटी को बुलाकर पानी मांगेगा। कोमल-कोमल चेहरे पर भी तरस नहीं खाया। बच्चों की मां पर भी नहीं तरस खाया। क्या बितेगी उसके उपर? धत्त तेरी मर्दानगी कसाई बाप निकला। बेटियों की आत्मा तुझे बख्शेगी नहीं। तू जल्लादों का जल्लाद निकला।

बेटियां घर की रौनक थी। हंसती खिलखिलाती रहती थी। मां की सहारा थी। तुम्हारी एक हिम्मत की तरह थी। अब तुझे पापा कौन कहेगा? घर की लक्ष्मी का कत्ल कर दिया। घर की रोशनी ही बुझा दी। पत्थर दिल बेरहम। तुझे ईश्वर और पूरी दुनिया कभी माफ नहीं करेगा।

कुछ दिनों से मैं बहुत दुखी हूँ। कोई भतीजे को पटक-पटक कर मार रहा है । कोई बेटियों का गला काट दे रहा है। कोई पत्नी की हत्या कर रहा है। बेटा, अपने मां, बाप, बहन को मार दे रहा है। भाई, भाई का कत्ल कर दे रहा है। बाप, बेटा को मार दे रहा है। किस जमाने में जी रहा हूँ। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। हे प्रभु! अब आप ही इस अनर्गल कृत्य को रोक सकते हैं और किसी के बस का नहीं है।

— जयचन्द प्रजापति ‘जय’

*जयचन्द प्रजापति

प्रयागराज मो.7880438226 jaychand4455@gmail.com

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