कविता

हमला

आप लाखों बार ले जाओ
शांति के फूलों से सजा गमला,
तुच्छ मानसिकता के अधीन लोगों को
फिर भी न पड़ेगा कोई फर्क,
क्षण भर में कर बैठेंगे
आप पर सीधा हमला।

उन्हें शांति और सौहार्द्र
कभी रास नहीं आता,
उनकी सोच पुरातन संदूकों में
कहीं दबा-सा रह जाता।

प्रथम प्रहार भले ही मानसिक है,
पर स्वभाव उनका तामसिक है,
बुद्धि पर कब्ज़ा कर हर ओर बैठे,
अहंकार उनका स्वाभाविक है।

जिनके बल पर ऐंठे-ऐंठे
वे सत्ता का सुख भोग रहे,
जब तर्कों से हारने लगते,
तो हिंसा के पथ पर दौड़ रहे।

यदि न मिले इस हमले में सफलता,
और प्रबुद्धों से मिलने लगे विफलता,
तब अपनी औकात पर उतर आते हैं,
शस्त्रों, घूँसों और लातों से
अपना चेहरा दिखलाते हैं।

उनके हमले सहने की
लोगों को आदत पड़ी हुई है,
पर समय बदल रहा है अब,
नवचेतना भी खड़ी हुई है।

अब भी मत ओढ़ो
चुप्पी की यह भारी नकाब,
शिक्षित बनकर दो उन्हें
विचारों से प्रखर जवाब।

सब कुछ सह लेंगे वे,
पर तुम्हारी शिक्षा नहीं,
यह देश जितना उनका है,
उतना ही तुम्हारा भी सही।
अब अपने हिस्से का संपूर्ण पाने में
और प्रतीक्षा नहीं।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

Leave a Reply