आस्तिक और नास्तिक
मेरे विचार में इस संसार में जितने भी आस्तिक हैं उनमें ज्यादातर वास्तव में नास्तिक ही है। और समाज जिन्हें नास्तिक मानता है वो ही वास्तव में आस्तिक हैं। यहाँ आस्तिक वो हैं जिन्होंने ईश्वर (या यूँ कहें कि universal energy) को जानने की बजाये केवल सीखे सिखाए ज्ञान पर आश्रित होकर अपने अपने भगवान मान लिए। और अपनी अपनी सुविधा और स्वादानुसार न्याय अन्याय की परिभाषा भी गढ़ ली। फॉर एग्जाम्पल जितने भी धर्म के लोग हैं सबकी किताबों में नॉन वेज खाने की सुविधा है तो वो मान के चल लेते हैं की हमारी तो किताबों में हमारे धर्म के ठेकेदारों ने मनाही नहीं की इसलिए हम नॉन वेज खा सकते हैं। यानी कि धर्म को आधार मानकर सुविधाएं उठाते रहो।९९% लोग ज़िंदगी भर हिंसा करते हैं मार काट मचाते हैं ग़लत करते हैं लोगों का अधिकार छीनते हैं लेकिन एंड में अपने धार्मिक स्थल पर जाकर हाथ जोड़कर माफ़ी मांगने का नाटक करते हैं और व्हान खड़ा हुआ धर्म का ठेकेदार उनसे चढ़ावा लेकर उन्हें सांत्वना देता है की ईश्वर आपकी सुन लेंगे और आपको माफ कर देंगे। यह भी एक facility है सभी धर्मों में। और क्या चाहिए आदमी को? बस यही फैसिलिटी ज़िंदगी भर दूसरों की ऐसी तैसी करने की परमिशन दे देती है क्यूँकि धर्म के ठेकेदारों ने यह डेसिलिटी दी है की कुछ उपाय कर लो तो उन्हें मोक्ष मिल जाएगा।सच कहूँ तो यह सारा समाज नास्तिक ही है। और जो नास्तिक है उनके फिर भी कुछ आस्तिक मिल जायेंगे क्युकी वो नास्तिक अगर अच्छाई करते हैं तो किसी लालच में नहीं करते। वो केवल इसलिए अच्छा करते हैं क्यूँकि उनकी मानसिकता अच्छा करने की होती है। वो किसी डर से अच्छा नहीं करते।तो फिर… क्या फ़ायदा ऐसी आस्तिकता का, क्या फ़ायदा ऐसे धर्मों का जो इंसान का खून करके भी ख़ुद को सही ठहराने का काम करे क्युकी उनकी किताबों में ऐसी फैसिलिटी है।आज के समाज की यही सच्चाई है। काश कोई भगवान ना होता लेकिन लोग एक दूसरे का निःस्वार्थ अच्छा कर सकते। मगर यहाँ हर प्राणी को केवल उस पल का इंतज़ार होता है कब उसे मोक्ष प्राप्ति के उपाय बताये जायेंगे और वो ख़ुशी ख़ुशी मान भी लेगा की अब तो मोक्ष मिलना तय है।
