व्यंग्य – नंगों का हमाम
चोरी अपराध नहीं, भारतवर्ष की आदिकालीन संस्कृति है। ये संस्कार है जो प्रत्येक भारतीय के डीएनए में पाया जाता है। गर्भस्थ भ्रूण भीतर से ही आसपास के परिवेश को देखकर अभिमन्यु की भांति चोरी के चक्रव्यूह में घुसने का प्रशिक्षण पा जाता है। बाहर निकलना उसे नहीं आता,क्योंकि उसके बाप को भी उस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का गुर नहीं पता। वास्तव में चोरी की चाशनी का स्वाद सबसे स्वादिष्ट है। भगवान कृष्ण भी इससे नहीं बच पाए। माखनचोर बन गये। चोरी को ‘रसराज’ घोषित कर देना चाहिए। वास्तव में इसे चखने के बाद कोई इसे छोड़ना नहीं चाहता। शराब और अन्य लतें छूट सकती हैं, पर चोरी नहीं। चोरी, कबीर बाबा का गुड़ है, और चोर मक्खी। एक शाश्वत प्रोडक्ट! चिपकने के मामले में फेविक्विक और फेविकोल से भी पक्का!! बेचारी मक्खी का क्या दोष वह तो सिर्फ गुड़ चाटकर उड़ जाना चाहती थी,पर कमबख्त गुड़ ही उसके पंख नहीं छोड़ता।-
“माखी गुड़ में गड़ि रही, पंख रह्यो लपटाय।
हाथ मलै और सिर धुने, लालच बुरी बलाय!!”
भारत में चोरी करना एक शिष्टाचार है। समाज ने नाहक उसे भ्रष्टाचार की श्रेणी में रखा है। परीक्षा में नकल मारने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती, पर चोर विद्यार्थी अच्छे अंक प्राप्त कर अभिभावकों की आँख का तारा बन जाता है। बेटी के लिए योग्य वर खोजनेवाले सास-ससुर की नज़र तनख्वाह पर नहीं, दामाद की ‘ऊपरी-कमाई’ पर होती है। टैक्स चोरी करनेवाला व्यापारी धार्मिक कर्मों में दान करने पर समाज चोरी में डिस्काउंट दे देता है। चोर-चोर मौसेरे भाई! समाज जानता है कि “भैया जी” ने सरकारी पद पर रहते हुए जम से मलाई खायी है, लेकिन “समाज-शिरोमणि” और “समाज-रत्न” की पदवी इन्ही के लिए सुरक्षित है। सरकार को तो इस श्रेणी के लोगों को पद्म-पुरस्कारों में शामिल करना चाहिए साहब। यकीन मानिए राष्ट्रपति महोदय पुरस्कार बाँटते थक जाएँगे पर प्रतिभाएँ समाप्त नहीं होगी। चोरी एक स्वजनित संस्कार है। एक कला है, जो अदृश्य रूप से की जाती है किन्तु फिर भी दिख जाती है।
कहानियों और फिल्मों में दिखाया गया कि भूख इंसान को चोर बना देती है। फिल्म ‘रोटी’ का नायक जिंदगी भर एक रोटी के लिए चोरी करता है। ‘दीवार’ फिल्म में इंस्पेक्टर भाई का हृदय परिवर्तन भी तब ही होता है उसके लिए एक रोटी चुरानेवाले गरीब शिक्षक का बेटा उसकी गोली का शिकार हो जाता है, आदि। नहीं, मुझे सिर्फ भूख या रोटी चोरी का कारण नहीं लगती। चोरी एक हवस है। भूख तो एक रोटी से भी मिट जाती है। ये हवस है एक सामाजिक प्रतिष्ठा पाने की। शान-शौकत और विलासिता की। दिखावे की अंधी दौड़ में श्रेष्ठ-श्रेष्ठतर-शेष्ठतम बनने की। चोरी करने में मज़ा आता है और चोरी का माल ज्यादा लज्जतदार होता है, इसलिए चोरी करने में लज्जा नहीं आती। बचपन में सामने आमों से भरी टोकनी में से आम खाने के बाद वह आनंद नहीं आता था जो गाँव की अमराई से एक आम चुराकर खाने में मिलता था। उस एक आम की चोरी में मेरा पुरुषार्थ होता था, माली की गालियाँ होती थी, पकड़ेजाने का भय होता था। और आप हैं कि चोरी को दुष्कर्म कहते हैं। लानत है आपकी सोच को।
अब देश में हल्ला मचा है कि मर्यादा पुरुषोत्तम के घर चोरी हो गई। भाई चोरी नहीं हुई। सेंधमारी हुई है। चोरी तो एकाद रोटी के लिए की जाती है। आदरणीय राजेंद्र नेमा ‘क्षितिज’ जी ने कहा है –
“वो ज़रूरत बहुत बड़ी होगी
जो उसूलों से लड़ पड़ी होगी
चोरी भूखे ने कर ली मंदिर में
भूख भगवान से बड़ी होगी”
तो भाई ये चोरी रोटी के लिए नहीं है। जरूर किसी बड़े उद्देश्य की प्राप्ति के लिए की गई है। ये चोरी समाज में आत्म-सम्मान की भूख के लिए , प्रतिष्ठा की भूख के लिए की गई है। अब बेचारा पकड़ में आ गया तो फजीहत हो रही है। अन्यथा आप ही उसे लक्ष्मी-पुत्र, दानवीर आदि कहकर सम्मानित करते। भला करोड़ो की चोरी को चोरी कहना कहाँ का न्याय है? चोरी तो दस-पाँच रूपये की होती है, या वह होती है जो बनिए की दुकान में उसका नौकर एक काजू खाकर कर लेता है।
ये चोरों का समाज है। पकड़े गये तो चोर, नहीं तो आदरणीय। बस आपको छिपाने की कला आनी चाहिए। कोई छोटा चोर तो कोई बड़ा। हमाम में सब नंगे है। ये नंगों का हमाम है। इसलिए एक-दूसरे चड्डी मत उतारिए।
— शरद सुनेरी
