स्वप्नबाग
एक दिन मैं गई स्वप्न बाग में,
पौधे उसमें खूब लगे थे ।
कुछ पौधों में चाँदी के सिक्के,
कुछ में मोती से लटके थे ।
घास भी अजब निराली देखी,
उसमें कुछ मूँगे बिखरे थे ।
लाल चमकते नन्हे-नन्हे ,
मेरे पैरों में चुभते थे ।
मानव जैसे पेड़ खड़े थे,
कुछ शर्माए, कुछ झिझके से।
कुछ गर्वित से, कुछ क्रोधित से,
फुनगी ऊंची, कुछ अकड़े से ।
नदी नहीं थी, दूध था बहता ।
काजू और बादाम पड़े थे ।
शरबत का बहता था झरना,
कुल्फी के पहाड़ बड़े थे ।
मम्मी ने आवाज लगाई,
हम तो नीचे गिरे पड़े थे ।
बिस्तर पर सोए थे रात को,
सपनों में स्वप्न बाग गए थे ।
— बृजबाला दौलतानी
