जाते ही श्मशान में मिट गई दूरियां
जीवन भर की
मन की कड़वाहटें,
साथ चलीं।
अहम के पर्वत,
ऊँचे थे बहुत,
ढह गए सब।
रिश्तों के बीच
जो दीवारें थीं,
राख हुईं।
मौन चिताएँ,
सच का पाठ पढ़ाएँ,
क्षणभंगुरता।
कल तक जिनसे
नज़रें चुराते थे,
पास खड़े थे।
श्मशान पहुँचे,
सब भेद भूल गए,
मन पिघला।
मिट्टी ने फिर
सबको एक किया,
सत्य यही।
— डॉ. अशोक
