कम में खुश रहिए
कम में खुश रहिए, खुशी कम नहीं होगी,
मन की यह दौलत कभी कम नहीं होगी।
महलों की चमक से जीवन नहीं सँवरता,
अपनेपन की धूप से हर आँगन निखरता।
संतोष के दीपक से राहें नई जगमगाएँगी,
ये छोटी-सी मुस्कान भी बड़ी लग जाएगी।
यूं थोड़ी-सी रोटी में स्वाद बहुत मिलता है,
सच के रिश्तों में सुख का फूल खिलता है।
इच्छाओं की दौड़ यदि थोड़ी थम जाएगी,
मन की चिड़िया फिर खुलके गुनगुनाएगी।
जो मिला है आज, उसे प्रेम से अपनाइए,
हर पल में छिपी कृपा को हृदय से गाइए।
कम में खुश रहिए यही जीवन का सार है,
यह संतोषी मन ही सबसे बड़ा धनवान है।
हाँ, कम में खुश रहें खुशी कम नहीं होगी,
मन की यहीं दौलत कभी कम नहीं होगी।
— संजय एम तराणेकर
