सांख्यिकी पर मार्क से सीधा संवाद
मार्क, सच मानो, मैं तुमसे ज़रा भी इत्तेफाक नहीं रखता,
सांख्यिकी ज्ञान, सफेद झूठ के परे, दर्ज हो नहीं सकता॥
जन्म से मृत्यु तक का सफर, प्रायिकता से बंधा है,
हर क्षण मनुष्य किसी-न-किसी पशोपेश में पड़ा है॥
कैसे कहते हो, झूठ को इसने पलट कर पेश किया है,
जबकि इस विज्ञान ने ही सत्य को प्रबलता से गढ़ा है॥
नमूनों के विश्लेषण से, समष्टि का बोध होता है,
आंकड़ों के गहन परीक्षण से ही तो शोध होता है॥
तुम्हारे दृष्टिकोण में, सांख्यिकी ज्ञान निकृष्ट है,
यक़ीन करो, दृश्य निरूपण में यही उत्कृष्ट है॥
मार्क, सच मानो, मैं तुमसे ज़रा भी इत्तेफाक नहीं रखता,
सांख्यिकी ज्ञान, सफेद झूठ के परे, दर्ज हो नहीं सकता॥
क्या गिन सकोगे तुम धरा, नभ और जल के जीव?
छोड़ो, नहीं आसान, ऐसे विज्ञान को करना सजीव॥
भ्रम में न रहो, न हिला सकोगे कभी इसकी नींव,
मजबूत तंत्र इसका, हर विषय तक इसकी तसदीक॥
मानव विकास को विभिन्न पैमानों पर नाप देता है,
आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन को दर्शा देता है॥
मूल्यांकन, विश्लेषण, चित्रण, प्रदर्शन कर देता है,
फिर भी तुम मान बैठे, यह सत्य को झुठला देता है॥
मार्क, सच मानो, मैं तुमसे ज़रा भी इत्तेफाक नहीं रखता,
सांख्यिकी ज्ञान, सफेद झूठ के परे, दर्ज हो नहीं सकता॥
अनगिनत ज्ञानी विद्वानों ने इसमें योगदान दिया,
किस-किस का नाम लूं, उन्होंने क्या-क्या किया॥
फिशर ने विचरण-विश्लेषण, महालनोबिस ने दूरी-माप दिया,
यूँ ही गिनाया, वरन् फ़हरिस्त है, जिन्होंने काम किया॥
हां, सुना है मैंने भी कई बार, विषय निपट नीरस है यह,
उत्तर देता हूं, जिन्हें संख्या से प्यार नहीं, वह क्या जाने॥
सुनो, यहाँ दो और दो, चार नहीं, कुछ कम-ज्यादा है,
जो समझ गया, वही इसे सच्चे अर्थों में पहचाने॥
तुम या तो आओ इस धरती पर, पुनः जन्म लेकर,
या फिर प्रतीक्षा करो, जब मिलेंगे तब बात करेंगे॥
जो दूरी इसने तय की है, बिना घबराए, विचलित हुए,
यक़ीनन, तुम्हारे विचार, उससे कुछ-न-कुछ सुधरेंगे॥
मार्क, सच मानो, मैं तुमसे ज़रा भी इत्तेफाक नहीं रखता,
सांख्यिकी ज्ञान, सफेद झूठ के परे, दर्ज हो नहीं सकता॥
— पंकज नैथानी ‘सिद्धा’
