अन्तः अस्ति आरम्भः
निहार रहा था वह, अश्वत्थ की झूलती डाल।अनिल-झंझा के संग, जो मिला रही थी ताल।।उत्पन्न, पल्लवित जिस पर, पर्ण हुआ
Read Moreनिहार रहा था वह, अश्वत्थ की झूलती डाल।अनिल-झंझा के संग, जो मिला रही थी ताल।।उत्पन्न, पल्लवित जिस पर, पर्ण हुआ
Read Moreमार्क, सच मानो, मैं तुमसे ज़रा भी इत्तेफाक नहीं रखता,सांख्यिकी ज्ञान, सफेद झूठ के परे, दर्ज हो नहीं सकता॥ जन्म
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