विभाजन और मानवता
विभाजन की वह विभीषिका,घाव अमिट, पीड़ा अपार।बिछड़े अपने, उजड़े आँगन,टूटे कितने सपनों के संसार। समय भले ही घाव भुलाए,स्मृतियाँ फिर
Read Moreविभाजन की वह विभीषिका,घाव अमिट, पीड़ा अपार।बिछड़े अपने, उजड़े आँगन,टूटे कितने सपनों के संसार। समय भले ही घाव भुलाए,स्मृतियाँ फिर
Read Moreकिताबों के सफ़हों मेंजो उलझा रहा उम्र भर, वो बस पढ़ा-लिखा रहा,समझदार न बन सका। जो तजुर्बों की आग मेंहर
Read Moreराज़ और पहचान हमने जब से तेरे राज़ जाने,ज़िंदगी के अस्ल अक्स पहचाने।धोखे से जो बढ़ते रहे आगे,अक़्ल आई तो
Read Moreनिहार रहा था वह, अश्वत्थ की झूलती डाल।अनिल-झंझा के संग, जो मिला रही थी ताल।।उत्पन्न, पल्लवित जिस पर, पर्ण हुआ
Read Moreमार्क, सच मानो, मैं तुमसे ज़रा भी इत्तेफाक नहीं रखता,सांख्यिकी ज्ञान, सफेद झूठ के परे, दर्ज हो नहीं सकता॥ जन्म
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