कविता

अन्तः अस्ति आरम्भः

निहार रहा था वह, अश्वत्थ की झूलती डाल।
अनिल-झंझा के संग, जो मिला रही थी ताल।।
उत्पन्न, पल्लवित जिस पर, पर्ण हुआ लाल।
विच्छिन्न हुआ उससे, जैसे बीत गया हो साल।।

जीवन-संगीत ठहरा, अब अवश्य नवीन होगा।
शांत सरोवर-तल पर जब, पर्ण स्थिर होगा।।
चिन्तामग्न पर्ण विचारे, उसे कुछ करना होगा।
जाऊँ क्यों यूँ ही, निशाँ मुझे भी छोड़ना होगा।।

जल तक पहुँचा जब, हर्षित स्पर्श-नमन हुआ।
वृत्ताकार वीचियों का, उस बिन्दु से उदय हुआ।।
क्षणभर मे अन्त, अनन्त हो विस्तारित हुआ।
शुष्क पर्ण-निशाँ से, नव-जीवन सृजित हुआ।।

कभी क्षणभर, कभी संवत्सर, और कभी काल।
जीवन गतिमान सदैव, निज स्वाभाविक चाल।।
फिर फिक्र क्या, चलो चलें हम भी अपने हाल।
संभला, उठा, चल पड़ा गढ़ने अपनी मिसाल।।

— पंकज नैथानी ‘सिद्धा’

पंकज नैथानी

श्री पंकज नैथानी को इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, आगरा से सांख्यिकी विषय में एम० फिल० की डिग्री प्राप्त है। वे अर्थ एवं सांख्यिकी सेवा के 1992 बैच के अधिकारी हैं। उनका 33 वर्षों का शासकीय अनुभव अत्यन्त व्यापक और विविध है। उन्होंने उत्तराखंड में अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय एवं आई० टी० डेवलपमेंट एजेंसी प्रारम्भ करने तथा विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित ई-गवर्नेंस परियोजना की पी० एम० यू० और सार्वजनिक-निजी भागीदारी सेल की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे भारत निर्वाचन आयोग के स्वीप कार्यक्रम हेतु उत्तराखंड के डिप्टी सी० ई० ओ० रह चुके हैं। वे उत्तराखंड सेवा का अधिकार आयोग और उत्तराखंड अधीनस्थ कर्मचारी चयन आयोग के प्रथम सचिव भी रहे। हाल ही में उन्होने लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी के ग्रामीण अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर का अपना कार्यकाल पूरा किया, जिसके उपरान्त वे वर्तमान में अपने विभाग में अपर निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। वे मूलतः एक शोधकर्ता और शिक्षाविद् हैं, जिनके कई शोध-पत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हैं और जिन्होने विभिन्न पुस्तकों का संपादन भी किया है।

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