मन आकाशगंगा
हृदय के भीतर
न जाने कितने ब्रह्मांड बसते हैं।
विचार कभी ग्रह बनकर
परिक्रमा करते हैं,
कभी टूटते तारों-से
बिखर जाते हैं।
कुछ स्मृतियाँ चाँद की
शीतलता बनकर ठहरती हैं,
तो कुछ इच्छाएँ
सूर्य-सी दहकती रहती हैं।
और मन इन्हीं अनगिनत
आकाशगंगाओं में भटकता है।
और जो शब्दों में उतर आता है,
आपके पास चला आता है।
आपके स्नेह और दुलार के लिए।
— सविता सिंह मीरा
