कविता

मन आकाशगंगा

हृदय के भीतर
न जाने कितने ब्रह्मांड बसते हैं।
विचार कभी ग्रह बनकर
परिक्रमा करते हैं,
कभी टूटते तारों-से
बिखर जाते हैं।

कुछ स्मृतियाँ चाँद की
शीतलता बनकर ठहरती हैं,
तो कुछ इच्छाएँ
सूर्य-सी दहकती रहती हैं।

और मन इन्हीं अनगिनत
आकाशगंगाओं में भटकता है।

और जो शब्दों में उतर आता है,
आपके पास चला आता है।
आपके स्नेह और दुलार के लिए।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com

Leave a Reply