इरादों में कमी कैसे आई
धूप मुस्काई,
मन ने पूछा चुप—
इरादे कहाँ?
सूना पथ था,
पत्ते बोले धीरे—
कदम ठिठके।
ओस की बूँद,
साहस फिर चमका—
भोर जागी।
ऊँचा पर्वत,
नज़र रही अडिग—
मन बढ़ चला।
हवा ने कहा,
मत छोड़ो सपने—
आकाश सुनता।
इरादों में
कमी कैसे आई?
मन ही उत्तर।
— डॉ. अशोक
