स्वच्छंद मुक्तक
राज़ और पहचान
हमने जब से तेरे राज़ जाने,
ज़िंदगी के अस्ल अक्स पहचाने।
धोखे से जो बढ़ते रहे आगे,
अक़्ल आई तो वे शख़्स पहचाने।।
वजूद
अप्रत्यक्ष रहकर कमाते रहे,
प्रत्यक्ष होकर दिखाने आये हो।
ज़माने ने जब पहचाना नहीं,
तो अपना वजूद जताने आये हो।।
आधार
पाटों ने नदी को, जड़ों ने पेड़ों को,
बिखरने और उखड़ने नहीं दिया।
अरे, विश्वास करो—यही वे साधन हैं,
जिन्होंने उनका रूप सँवार दिया।।
मशक्कत
मशक्कत के बिना
मंज़िल मुक़द्दर में नहीं आती।
वहाँ जीत कैसी,
जहाँ बाज़ी कभी हारी नहीं जाती।।
— पंकज नैथानी ‘सिद्धा’
