एक लघु नज़्म – तजुर्बा
किताबों के सफ़हों में
जो उलझा रहा उम्र भर,
वो बस पढ़ा-लिखा रहा,
समझदार न बन सका।
जो तजुर्बों की आग में
हर रोज़ ख़ुद को तपाता रहा,
वही ज़िंदगी को पढ़ गया,
वही पढ़-लिख गया।।
— पंकज नैथानी ‘सिद्धा’
किताबों के सफ़हों में
जो उलझा रहा उम्र भर,
वो बस पढ़ा-लिखा रहा,
समझदार न बन सका।
जो तजुर्बों की आग में
हर रोज़ ख़ुद को तपाता रहा,
वही ज़िंदगी को पढ़ गया,
वही पढ़-लिख गया।।
— पंकज नैथानी ‘सिद्धा’