विभाजन और मानवता
विभाजन की वह विभीषिका,
घाव अमिट, पीड़ा अपार।
बिछड़े अपने, उजड़े आँगन,
टूटे कितने सपनों के संसार।
समय भले ही घाव भुलाए,
स्मृतियाँ फिर भी साथ रहें।
पर उन पीड़ाओं को लेकर,
क्यों मन में अब भी रार रहे?
आओ, करें प्रार्थना उनके लिए,
जिन्होंने खोए अपने प्राण।
जिनके घर-परिवार बिखर गए,
जिनसे छूटा उनका जहान।
दुःख मिटे, मिटे मन से घृणा,
शोक बने करुणा की धार।
बीते कल से सीख लेकर,
रचें प्रेम का नया संसार।
तत्समय घायल हुई मानवता,
दोबारा न घायल होने पाए।
नफ़रत की हर दीवार ढहे,
प्रेम का दीप सदा जगमगाए।
गहरी निराशा के उपरांत ही,
आशा की नव-किरणें आती हैं।
कष्ट से उबर, क्रोध को छोड़,
नई दिशाएँ स्वयं बन जाती हैं।
विभाजन रहे बस स्मृति बनकर,
मन में उसका भाव न हो।
अतीत से सीख मिले यही—
मानवता का फिर बँटवारा न हो।
— पंकज नैथानी ‘सिद्धा’
