कविता

विभाजन और मानवता

विभाजन की वह विभीषिका,
घाव अमिट, पीड़ा अपार।
बिछड़े अपने, उजड़े आँगन,
टूटे कितने सपनों के संसार।

समय भले ही घाव भुलाए,
स्मृतियाँ फिर भी साथ रहें।
पर उन पीड़ाओं को लेकर,
क्यों मन में अब भी रार रहे?

आओ, करें प्रार्थना उनके लिए,
जिन्होंने खोए अपने प्राण।
जिनके घर-परिवार बिखर गए,
जिनसे छूटा उनका जहान।

दुःख मिटे, मिटे मन से घृणा,
शोक बने करुणा की धार।
बीते कल से सीख लेकर,
रचें प्रेम का नया संसार।

तत्समय घायल हुई मानवता,
दोबारा न घायल होने पाए।
नफ़रत की हर दीवार ढहे,
प्रेम का दीप सदा जगमगाए।

गहरी निराशा के उपरांत ही,
आशा की नव-किरणें आती हैं।
कष्ट से उबर, क्रोध को छोड़,
नई दिशाएँ स्वयं बन जाती हैं।

विभाजन रहे बस स्मृति बनकर,
मन में उसका भाव न हो।
अतीत से सीख मिले यही—
मानवता का फिर बँटवारा न हो।

— पंकज नैथानी ‘सिद्धा’

पंकज नैथानी

श्री पंकज नैथानी को इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, आगरा से सांख्यिकी विषय में एम० फिल० की डिग्री प्राप्त है। वे अर्थ एवं सांख्यिकी सेवा के 1992 बैच के अधिकारी हैं। उनका 33 वर्षों का शासकीय अनुभव अत्यन्त व्यापक और विविध है। उन्होंने उत्तराखंड में अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय एवं आई० टी० डेवलपमेंट एजेंसी प्रारम्भ करने तथा विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित ई-गवर्नेंस परियोजना की पी० एम० यू० और सार्वजनिक-निजी भागीदारी सेल की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे भारत निर्वाचन आयोग के स्वीप कार्यक्रम हेतु उत्तराखंड के डिप्टी सी० ई० ओ० रह चुके हैं। वे उत्तराखंड सेवा का अधिकार आयोग और उत्तराखंड अधीनस्थ कर्मचारी चयन आयोग के प्रथम सचिव भी रहे। हाल ही में उन्होने लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी के ग्रामीण अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर का अपना कार्यकाल पूरा किया, जिसके उपरान्त वे वर्तमान में अपने विभाग में अपर निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। वे मूलतः एक शोधकर्ता और शिक्षाविद् हैं, जिनके कई शोध-पत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हैं और जिन्होने विभिन्न पुस्तकों का संपादन भी किया है।