कविता

मैं नहीं मासूम या भोला

मत कह मुझे सीधासाधा, भोला या मासूम,
वक्त पड़े तो दिखा सकता हूँ
अपना अनदेखा रौद्र रूप।

कर लो जितनी मनमानियाँ करनी हैं,
जो कर रहे हो, करते रहो,
औरों के हिस्से छीनकर
अपने महल सजाते रहो।

मैं उस दिलासे में नहीं जीता
कि ऊपर बैठा कोई देख रहा है,
या कहीं छिपकर
तुम्हारे कर्मों पर आँखें सेंक रहा है।

जिस दिन मैंने देखना शुरू कर दिया,
हिसाब लगाना शुरू कर दिया,
उस दिन से उठ सकता है ऐसा सैलाब
जो बड़े-बड़ों को बहा सकता है,
सच, हकीकत और व्यवहार का
आईना दिखा सकता है।

मैं प्रारंभ से ही खोता आया हूँ
जिसे तुमने सहेज रखा है
डर, धमकी और दंभ के सहारे।

मेरी चुप्पी मेरी कमजोरी नहीं,
सहन करना कोई सीनाजोरी नहीं।
जिस दिन अपने नुकसान की कीमत
ठीक-ठीक आँक लूँगा,
उखाड़ दूँगा तुम्हारी
किस्मत और भाग्य की जड़ें।

इसलिए मानवीय संवेदनाओं को
थोड़ा समझो, थोड़ा परखो,
क्योंकि कभी भी ठिठक सकता है
तुम्हारी द्रुत भागती उन्नति का घोड़ा।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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