कविता

ये हम कहां जा रहे है….

ये हम कहां जा रहे है?

संवेदनाहीन, भावशून्य, 

पिशाच वृत्ति से लिपट,

मानव जीवन की अस्थियां ले,

संस्कारों की धज्जियां उडाते,

आधुनिक हो रहे हैं हम?

कैसी प्रगति है?

कैसी पाशवी सोच है?

चाँद की चकोर बन 

कौन वहशी है बना?

पावन प्रेम भाव को 

लहूलुहान कर रहा?

इनकी बोटी-बोटी नोंच दो,

कत्ल वाले हाथों को मरोड़ दो। 

मिटा दो इनकी छाया भी,

धरा कलुषित न हो जाए कहीं।

या सरेआम लटका ही दो,

फाँसी के फंदे से,

ताकि कहीं कलेजे का तुकड़ा,

बेमौत न मारा जाए।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८

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