विभाजन विभीषिका की स्मृति में
14 अगस्त, 1947 को, भारत का हुआ विभाजन था।
हो गए असंख्य लोग बेघर, क्रूरतापूर्ण विस्थापन था।
कोटिक जन थे शरणार्थी बने, विकराल त्रासदी को झेला।
भारत से पाक विभाजन था, कूटनीतिक षड़यंत्रों का खेला।
देश के कर्णधारों ने की, ऐतिहासिक बहुत बड़ी भूलें।
एकता – भावना भंग हुई, हिल गयीं अखण्डता की चूलें।
साम्प्रदायिक दंगों में गाँव जले, संबंधों में आई दरार।
ट्रेनें लाशों से भरी मिलीं, गलियों में गूँजी चीत्कार।
कटु स्मृतियाँ मन पर छायीं, स्थायी गहरे मिले घाव।
विश्वासों पर आघात लगे, अंतस्थल में उपजे दुराव।
मिल गई देश को स्वतंत्रता, , जिसकी अति करुण कहानी थी।
पथरायी आँखों की पीड़ा, निर्दय छल ने कब जानी थी।
बहिनों की सूनी मांग हुई , माताओं ने बच्चे खोये।
महिलाओं की लुट गई लाज , भारत के लाल बहुत रोये।
सीमाओं की रेखाओं ने, कितने ही सपने तोड़े थे।
आँगन – आँगन था दर्द बसा , निज प्राण विवशजन छोड़े थे।
भारत माँ के दृग अश्रुभरे , थे शोकग्रस्त जीवन के पल।
बिछुड़े भाई, छूटा बचपन, उजड़ा था साँसों का संबल।
ईर्ष्या की ज्वाला धधक उठी, जाने कितने बुझ गए दीप।
दानवता अट्टहास करती, हो रहा मृत्यु – नर्तन समीप।
देश के कर्णधारों ने कीं, ऐतिहासिक बहुत बड़ी भूलें।
एकता – भावना भंग हुई, हिल गयीं अखण्डता की चूलें।
इतिहास न केवल दुखद स्वप्न, पीड़ा की है सच्ची गाथा।
भारत का आहत हुआ हृदय,लाज से झुका उन्नत माथा।
बीते दुर्दिन, भग्न – मन जुड़ें, अब प्रेमभाव के स्वप्न जगें।
विद्वेष-घृणा का कलुष मिटे, आशाओं के नवसूर्य उगें।
भूलें, अतीत की त्रुटियों को, अब अच्छे बनें पड़ोसी हम।
जड़ हरित वृक्ष की क्यों काटें, मिलजुलकर बाँटें खुशियाँ – गम।
स्मरण विभीषिका का करके, नवसृजन के दृढ़ संकल्प करें।
अपनाएँ विश्व – बंधुता को , उज्ज्वल विकल्प के भाव भरें।
रोड़े ना बनें धर्म – मजहब , आओ! मिलकर भ्रम दूर करें।
चेतना अखण्ड करें जाग्रत , अंतस की दारुण पीर हरें।
तुलसी, कबीर, जायसी. रहीम, नानक, रविदास की शुभ वाणी।
मानव – मानव से प्रेम करे, जीवनशैली हो कल्याणी।
हम दंश विभाजन का भूलें , फिर से न त्रासदी दोहराएँ।
बने ‘भारत एक – श्रेष्ठ भारत’ , सम्मान विश्वगुरु का पाएँ। ।
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
