लघुकथा- अहंकार न करने का प्रण
“विनीता जी, आपके पिताजी दुर्घटनाग्रस्त होकर हमारे अस्पताल में भर्ती हैं, आप जल्दी आइए.” सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ने फोन किया.
“उनकी हालत कैसी है?” विनीता पूछना चाहती थी, पर तब तक फोन बंद हो चुका था.
वह अस्पताल पहुंची और पिता की हालत पूछी.
“आपके पिताजी तो खतरे से बाहर हैं, पर जो इनको अस्पताल में लाया था और इनको अपना खून दिया, वह मर गया है.”
“ये तो बहुत दुःखद समाचार है,मैं उस देवदूत के अंतिम दर्शन करना चाहती हूँ.” उसने निहोरा किया.
डॉक्टर साहब ने उसे अनुमति दे दी
मॉर्चरी में जाकर उसने देखा कि यह वही लड़का था, जिसे दो दिन पहले उसने बहुत गरीब होने के कारण अपमानित किया था.”
“सचमुच अहंकार पतन का कारण है, शायद इसी का फल पिताजी को भुगतना पड़ रहा है, आगे से कभी अहंकार नहीं करूंगी.” पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए उसने प्रण किया और पिताजी की सेवा में संलग्न हो गई.
— लीला तिवानी
