कहानी लिखना तो सीख लिया तुमने शहज़ाद…
वह चौबीस साल की उम्र का अलबेलापन था, जब जिंदगी सिर्फ स्कूल के ब्लैक बोर्ड, चाक की धूल और चंद पारंपरिक वसूलों के इर्द-गिर्द घूमती थी। मैं, यानी शहज़ाद वहाँ एक शिक्षक था,बेहद संजीदा, बा-अदब और सिर्फ़ अपने काम से काम रखने वाला। फ़िर एक दिन स्कूल के गलियारे में एक नई मोहतरमा की आमद हुई। उनकी शख्सियत में गज़ब का ठहराव था और गुफ़्तगू में बेइंतहा तहज़ीब। उनका नाम था शबनम।
शुरुआत महज़ एक रस्मी सलाम-दुआ से हुई थी, लेकिन कब वह ख़ामोश इल्तिज़ा रोज़ के इंतज़ार में बदल गई, मालूम ही न हो सका। हम दोनों ही ज़िंदगी के उस मोड़ पर तन्हा थे। रफ़्ता-रफ़्ता (धीरे-धीरे) मुलाक़ातों का सिलसिला स्कूल की चारदीवारी से बाहर निकल आया। कभी शबनम मेरे इस सादा और ग़रीबखाने पर चाय के बहाने तशरीफ़ लातीं, तो कभी मैं उनके घर चला जाता। लेकिन हमारी मुलाक़ातों में हमेशा एक पाकीज़ा दूरी और शराफ़त का गहरा पर्दा रहा। हम घंटों बैठते, साहित्यिक बातें करते, जिंदगी के सुख-दुख बांटते। मुझे उनके लहज़े की मिठास सुनना अच्छा लगता था और वह भी… वह भी घड़ी की सुइयों पर नज़रें जमाए मेरा इंतज़ार किया करती थीं। हमने कभी अपनी हदों को फ़रामोश (विस्मृत) नहीं किया, न कभी किसी नैतिक लकीर को पार किया।
फिर अचानक एक दिन मालूम हुआ कि शबनम का वहाँ से ट्रांसफ़र हो गया है। वह मोड़ इतनी जल्दी आया कि मुझे संभलने का मौक़ा ही न मिला। वह चली गईं और उनके जाने के बाद संपर्क के तमाम साधन एक झटके में कट गए। मैं एक पागल, एक दीवाने की तरह तड़प कर रह गया। दिल मानता ही नहीं था कि कोई इतनी शिद्दत से मिलने के बाद यूँ एकदम दूर हो सकता है। मेरी हद से बढ़ी हुई शराफ़त और यह झिझक कि ‘मैं एक लड़की से अपने दिल का इज़हार कैसे करूँ’, मुझे ख़ामोश कर गई। मैं ख़ुद को उसी कमरे में क़ैद करके बैठ गया और बस यही सोचता रहा कि,,,
उसे कहना कि तेरी याद बहुत आती है,
यह भी कहना कि तेरे सिवा कोई और नहीं है मेरा।
लेकिन कौन था जो उसको मेरे दिल की तड़प की आवाज़ सुनाता,
उनके जाने के बाद, पूरे चार साल का लंबा अरसा गुज़र गया। यह चार साल मैंने किस तरह काटे, यह सिर्फ़ मेरा अल्लाह और मेरा दिल ही जानता है। मेरी रातों की नींद ग़ायब हो चुकी थी, मैं बिस्तर पर करवटें बदलता रहता था। आख़िर कार, मैंने अपने इस अधूरे इश्क़, उनकी बातों, उनके इंतज़ार और अपनी तन्हाई को एक कहानी की शक़्ल में लिख डाला और उसे एक मशहूर उर्दू मैगज़ीन में छपने के लिए भेज दिया। अवचेतन मन में उन तक पहुँचने की एक मद्धम सी उम्मीद के तहत, कहानी के आख़िर में मेरा नाम ‘शहजाद’ और मेरा मोबाइल नंबर भी प्रकाशित हो गया।
कहानी छपे हुए कुछ ही दिन गुज़रे थे कि एक शाम, मेरे फ़ोन की स्क्रीन चमक उठी। कोई अंजान नंबर था। मैंने जैसे ही कॉल रिसीव की, दूसरी तरफ़ से पहले एक गहरा सांस लेने की आवाज आई, और फ़िर… चार साल बाद, उस चिर-परिचित लर्ज़ती (कांपती) हुई आवाज़ ने मेरा नाम पुकारा,”शहजाद…”। मेरा दिल इतनी जोर से धड़का कि लगा पसलियां तोड़ देगा।
“कहानी लिखना तो सीख लिया तुमने शहज़ाद… पर काश उस वक्त बोलना भी सीख लिया होता,” शबनम फोन पर रो पड़ीं। “मैंने तुम्हारी कहानी का एक-एक लफ्ज़ पढ़ा। तो यह बात तुमने उस वक्त क्यों नहीं कही जब मैं तुम्हारे सामने बैठकर तुम्हारा इंतज़ार किया करती थी? जब तुम मुझसे इतनी मोहब्बत करते थे, तो साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहा? मैं तो लड़की थी… मैं कैसे पहल करती?”
मैंने धुंधलाती आंखों से कमरे के दरो-दीवार को देखा और जज़्बाती होकर कहा, “शबनम, मैंने इन चार सालों में किसी और के बारे में सोचा तक नहीं। मैंने आज तक शादी नहीं की… सिर्फ़ तुम्हारे इंतजार में।”
दूसरी तरफ़ एक दर्दनाक सन्नाटा छा गया। “तुमने शादी नहीं की…?” उन्होंने रोते हुए कहा, “और यहाँ मेरी शादी हो चुकी है! शहज़ाद, जब मेरा ट्रांसफर हुआ और तुमने मुझसे अपने दिल की एक बात न कही, तो मैं टूट गई। घर वालों का दबाव था, मैं लड़की थी, आख़िर कब तक लड़ती? मैंने शादी कर ली… लेकिन मेरा शौहर… उसका मिज़ाज, उसकी सोच मुझसे बिल्कुल अलग है।”
इस फ़ोन कॉल के बाद ज़िंदगी का एक नया और अजीब सिलसिला शुरू हो गया। पुरानी शराब और पुरानी मोहब्बत का यह फ़लसफ़ा सच साबित हुआ, इस मोहब्बत का नशा चार साल बाद भी कहाँ उतरा था! वह अक्सर रात के अंधेरे में, जब दुनिया सो जाती, मुझे मैसेज करतीं और अपने दिल का गुबार निकालतीं। उसके शौहर का मिज़ाज बहुत सख़्त था। उनकी शादीशुदा ज़िंदगी एक अज़ाब (नर्क) बन चुकी थी, रोज़-रोज़ की तकरारें और लड़ाई-झगड़े बढ़ रहे थे। लेकिन हम जब भी बात करते, अपनी मर्यादाओं और नैतिक हदों में रहकर ही करते। कोई गुनाह नहीं था, कोई ख़ता नहीं थी, बस दो अधूरे दिलों का एक ख़ामोश मानसिक सहारा था। लेकिन इस अंधी दुनिया और शक की नज़र को यह भी गवारा न हुआ।
एक रात, जब वह मुझसे फ़ोन पर बात कर रही थीं, उनके शौहर ने देख लिया। दूसरी तरफ़ से अचानक गुस्से में चिल्लाने और चीजों के टूटने की भयानक आवाजें आईं, और उस शख़्स ने यह कहते हुए शबनम पर हाथ उठा दिया कि ‘मैं सब जानता हूँ’। शबनम तड़प उठी, उसकी चीख मेरे कानों में गूंजी और फ़ोन ज़मीन पर गिर गया। मैं यहाँ अपने ग़रीबखाने में बैठा, तड़पता हुआ वह सब सुन रहा था, लेकिन कुछ करने के क़ाबिल नहीं था। मेरा जिस्म बर्फ़ की तरह जम गया था।
शक की उस खौफ़नाक लहर ने शबनम का बसा-बसाया घर हमेशा के लिए उजाड़ दिया। उनके शौहर ने बात को इस हद तक बढ़ाया कि आखिर कार बात तलाक़ पर जाकर ख़त्म हुई। उस शख़्स ने शबनम को बेघर कर दिया।
जब मुझे यह ख़बर मिली, तो शुरू में, मैं खुद को ही इस सब का कसूरवार मानकर ख़ामोश हो गया कि ‘कोई बात नहीं, जो हुआ सो हुआ… मेरी ख़ामोशी ही अब उनके लिए बेहतर है’। लेकिन मेरे अंदर के उस शिक्षक ने मुझसे कहा,,,”शहजाद! चार साल पहले की ख़ामोशी का खामियाज़ा तुम दोनों भुगत चुके हो, अगर अब भी ख़ामोश रहे तो मोहब्बत हार जाएगी और यह ज़ालिम दुनिया जीत जाएगी।”
मैंने हिम्मत की, अपने दिल की बात अपने घर वालों के सामने रखी और शबनम के मायके अदब के साथ शादी का पैग़ाम भेजा। वह वक्त बहुत नाजुक था, समाज की बातें थीं, तलाक़ का एक दाग़ था, लेकिन हमारी सच्चाई, पाकीज़गी और मेरी बरसों की बेलोस मोहब्बत के सामने हर दीवार रेत की तरह ढह गई। शबनम के घर वाले भी हमारी पाक नीयत को देखकर मान गए।
और फ़िर… एक परसुकून शाम, गवाहों की मौजूदगी में और तहजीब के मुकम्मल दायरे में, हम दोनों का निकाह हो गया।
जब काज़ी साहब ने पूछा और शबनम ने शर्म-ओ-हया और कांपती हुई आवाज़ में “कबूल है” कहा, तो मुझे लगा जैसे मेरी जिंदगी के सारे दुख़, सारी बेख्वाब रातें एक लम्हे में ख़त्म हो गईं। निकाह के बाद जब वह मेरे उसी पुराने ग़रीबखाने में आईं, तो वह घर वाकई ‘घर’ बन गया। मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया,वह हाथ जिसे मैंने सम्मान और मर्यादा की वजह से चार साल पहले कभी छुआ तक नहीं था,और उन्हें देखकर मुस्कुरा दिया। हमने अदब और शराफ़त का दामन कभी नहीं छोड़ा था, इसीलिए अल्लाह ने हमारी आज़माइश को रहमत में बदल दिया।
अब शबनम मेरे दिल में भी थी , मेरी क़िस्मत में भी थीं और मेरी क़ायनात में हमेशा के लिए मेरी शरीक़-ए-हयात (जीवनसंगिनी) बनकर सांस ले रही थीं। हमारी कहानी अब अधूरी नहीं थी, वह मुकम्मल हो चुकी थी।
कुछ लोग ज़िंदगी से चले तो जाते हैं, मगर दिल से कभी नहीं जाते…
उनकी याद, उनकी बातें, उनकी हंसी, सब कुछ दिल के किसी कोने में हमेशा जिंदा रहता है।
चाहे वक्त कितना भी गुज़र जाए, दिल एक ही नाम पर आ कर ठहर जाता है…
और फ़िर एहसास होता है कि मोहब्बत अगर सच्ची हो, पाकीज़ा हो, तो इंसान बदल सकता है, क़िस्मत बदल सकती है, और वह दिल जो किसी और का नहीं हो सकता था… आखिर कार अपने असल हकदार को मिल ही जाता है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
