विश्वास की डोर टूटी
विश्वास की डोरी टूट गई, सपनों की दुनिया छूट गई,
जिस हाथ में मेहन्दी सजनी थी, मृत्यु छाया लूट गई।
जिसने संग जीवन माँगा था, हरेक पल का वादा था,
वही बन अंधेरी राह चली, इरादा चिराग बुझाना था।
पहाड़ों की वो शांत खाई, इतनी दर्दीली कथा सुनाई,
हँसते चेहरे-मीठी बातें,सब निकली छल की परछाईं।
माँ की आँखें पत्थर बन गईं, पिता की साँसें थम गईं,
घर का उजियारा खोने से, दीवारें भी नम-सी हो गईं।
प्रेम अगर पावन होता है, तब जीवन को संवारता है,
स्वार्थ व छल के अंधकार में, सिर्फ विनाश उगाता है।
यह घटना कहानी नहीं, विश्वास टूटने की निशानी है,
मानवता से जो दूर हुआ, उसकी हर जीत बेमानी है।
ईश्वर से इतनी प्रार्थना हैं, हर घर में विश्वास बना रहे,
प्रेम सदा सम्मान बने, कोई भी केतन यूँ नहीं बिखरे।
(संदर्भ – पुणे, केतन को गहरी खाई में धकेला.)
— संजय एम तराणेकर
