कैसी झूठी बात
पत्थर भी अपने चले, अपने ही थे हाथ।
फिर कहते निर्दोष हैं, कैसी झूठी बात॥
आग लगाकर बस्तियाँ, करते ऊँची बात।
आँसू लेकर आँख में, ओढ़ें झूठी जात॥
सच के चेहरे ढँक दिए, झूठ हुआ विख्यात।
फिर कहते निर्दोष हैं, कैसी झूठी बात॥
नफ़रत बोई रात-दिन, बाँटे विष के बीज।
प्रेम-पत्र को फाड़कर, थाम लिया फिर खीझ॥
टूट गया विश्वास जब, रोए सब हालात।
फिर कहते निर्दोष हैं, कैसी झूठी बात॥
माचिस अपनी जेब की, करती खड़ा सवाल।
चिंगारी भी खुद रखी, फिर कैसा बवाल॥
धुएँ-धुएँ आकाश है, जलते सब जज़्बात।
फिर कहते निर्दोष हैं, कैसी झूठी बात॥
सत्ता, शोहरत, स्वार्थ में, भूले मानव-धर्म।
अपनों को ही घाव दें, बोल यही है कर्म॥
इतिहासों के पृष्ठ पर, लिख देगा दिन-रात—
पत्थर भी अपने चले, अपने ही थे हाथ।
फिर कहते निर्दोष हैं, कैसी झूठी बात॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
