डिफॉल्ट

दोहा छंद

आशीष 


आज कौन अब दे रहा, आप बताओ भाव।
सबको अब आशीष भी, लगता जैसे घाव।।

मातु-पिता आशीष लो, गुरुजनों के साथ।
तभी हमारे शीश पर, समझो ईश्वर हाथ।।

जैसी    करनी   हम   करें,   वैसा   पाते   रोज।
कलयुग में आशीष की, करें स्वार्थ की खोज।।

छलछंदो  की  आड़  में,      आशीषों  पर  वार।
समय साथ अब खो रहा, हम सबका संस्कार।।

मीठे बोल की आड़ में, कपट छिपाकर लोग।
देते  हैं  आशीष  भी,  मन  में  शापित  रोग।।

चाह रहे आशीष हैं, मम प्रियवर यमराज।
कहते हैं प्रभु दीजिए,  बने हमारा काज।।


पाते वही मुकाम 


सत पथ पर चलते हुए, लेते हैं प्रभु नाम।
वे सब इसके पात्र हैं, पाते वही मुकाम।।

जिनको खुद पर विश्वास है, अरु चलते अविराम।
बिना  किसी  अवरोध  के,   पाते  वही  मुकाम।।

जो चलते जिस राह पर, जैसा है आयाम।
अपने ढंग से एक दिन, पाते वही मुकाम।।

कर्म कंस रावण किए, फिर भी उनका नाम।
राम-कृष्ण  गाथा  गढ़े, पाते  वही  मुकाम।।

पाते वही मुकाम है, जो करते हैं कर्म।
सदा फिसड्डी वे रहें, जो रटते हैं धर्म।।

जो  भी  रचना  चाहते,    नूतनता   आयाम।
वे सब निश्चित एक दिन, पाते वही मुकाम।।


प्राण प्रतिष्ठा 


प्राण   प्रतिष्ठा   हो   गई,    मंदिर   में   श्रीराम।
आज जगत में बस गया, अवध नाम आयाम।।

प्राण प्रतिष्ठा संग में,  अवध में भारी भीड़। 
बालरूप श्रीराम जी, मुस्काते निज नीड़।।

भक्ति-भाव  से हो  रहा,  पूजन  अपने  राम।
कितने वर्षों बाद अब, मिला प्रभो को धाम।।

उत्साहित था विश्व भी, जागा नव विश्वास।
प्राण प्रतिष्ठा  बाद अब, पूरी होगी  आस।।

नहीं आप हम जा सके, भले अयोध्या धाम।
प्राण प्रतिष्ठा ज्यों हुई,   मन बोला श्री राम।।


चंदा चोर 


आया  ये  कैसा  समय, कलयुग  में  घनघोर।
भेष बदलकर भक्त का,  चंद   चढ़ावा  चोर।।

चंद चढ़ावा  चोर में, लिखा  लिया यदि नाम।
आप बिलबिला क्यों रहे, देख  रहे  श्री राम।। 

बैठे हैं श्री राम जी,   होता है जो खेल।
चंद चढ़ावा चोर की, चला रहे हैं रेल।।

राम   हमारे  हैं   प्रभो,  हम  हैं   उनके   भक्त।
जब तक उनकी है कृपा, कौन करे परित्यक्त।।

मंदिर  में  श्रीराम  के,    बैठे  चंदा  चोर।
रामराज्य में हो रहा, पाप बड़ा घनघोर।।

चंद चढ़ावा चोर ही, करें नाम बदनाम।
पाप कर्म करते रहें, बैठ छाँव श्रीराम।।

मन में कलुषित भावना, वाणी में श्री राम।
चंद  चढ़ावा  चोर  का, ऐसे चलता काम।।

जान  रहे प्रभु  राम जी, सब  चोरों  के  नाम।
गलती पर क्या दें सजा, और बहुत है काम।।

चंद  चढ़ावा  चोर  को,  कर  देंगे  बर्बाद।
कहते हैं यमराज जी, खा लेने दो खाद।।

गुस्से में यमराज भी, करें शिकायत राम।
चंदा चोरों में प्रभो, लिख  लो  मेरा नाम।।

चंद  चढ़ावा  चोर  को,  खोज  रहे  यमराज।
जब इनको होगी सजा, तभी करूँगा काज।।

छाया  में प्रभु  राम के,  बैठे  करते  काम।
अधम कृत्य करते रहे, सनातनी बदनाम।।

चंदा चोरी  से बड़ा, और भला क्या काम।
पापी मन में सोचते, क्या  कर  लेंगे राम।।

माना हम तो अधम हैं, फिर भी करें न शर्म।
तेरे  उत्तम  कर्म  से,      रोता  मानव  धर्म।।

चंदा  चोरी  से  बड़ा, उत्तम  क्या  है  काज।
मंदिर में प्रभु राम जी, सबसे बड़ा  है राज।।

कहा मित्र  यमराज ने, कर ले  उत्तम  कर्म।
चंदा  चोरी  कर  निभा,  पापी अपना धर्म।।


जीवन का आधार 


मातु-पिता को मानिए,  जीवन का आधार।
ईश्वर  की  इतनी  कृपा, कर  देते  संसार।।

जीवन के आधार को, करता  चल  मजबूत।
खुशियाँ तब ही साथ में, बनकर रहती दूत।।

जिनका खंडित हो गया, जीवन का आधार।
उनके  हिस्से  में  नहीं, अपनेपन  का सार।। 

जीवन  के  आधार  को,     देना  पड़ता  मान।
इसके बिन सब व्यर्थ है, जितना भी हो ज्ञान।।

रोना-धोना   छोड़िए,      नहीं   ठानिए   रार।
अभी आपके हाथ निज, जीवन का आधार।।


समय


 समय-समय की बात है, बैठे प्रभु दरबार।
चंदा  चोरी  हो  रहा, करते  भक्त  पुकार।।

लीला  देखो  काल  की, करता  है उपहास।
बेबस हैं अब मातु-पितु, टूट रही सब आस।।

कहते हैं यमराज भी, समय महज संयोग।
तेजी से यह बढ़ रहा, आज समाजी रोग।।

जो  करता है  काल का, सदा  उचित  सम्मान।
कितनी हो मुश्किल बड़ी, मिलता उसे निदान।।

वर्तमान  का  दे  रहा,    समय  हमेशा  सीख। 
कुछ के हिस्से खीर है, कुछ के हिस्से भीख।।


बात हमारी मान


कहते थे जब दादा -भैया, बात हमारी मान।
तब लगता था है हमें, इनसे  ज्यादा  ज्ञान।।

सतपथ पर चलना सदा, बात  हमारी  मान।
निंदा नफ़रत क्रोध का , मत पढ़ना विज्ञान।।

मातृशक्ति सम्मान का, नहीं भूलना पाठ।
बात हमारी मान लो, बाँधे  रखना गाँठ।।

 मातु-पिता, ईश्वर गुरू, सब है एक समान।
बात हमारी मान  लो, नहीं  बघारो  ज्ञान।।

मर्यादा के पार तुम, कभी न जाना मित्र।
बात हमारी मानना, धुँधला होगा चित्र।।

अपने बड़ों को मान दो, अरु छोटों को प्यार।
बात  हमारी  मान  लो,   तब  सुंदर  संसार।।

छोटा  सा  संदेश  है,       बात  हमारी  मान।
नहीं दिखाना तुम कभी, झूठी अपनी शान।।

नहीं छेड़ना  व्यर्थ  में, कभी  बेसुरा  तान।
प्रेम सहित रहना सदा, बात हमारी मान।।

अज्ञानी  बनकर  सदा,    लेना  सबसे  ज्ञान।
बात हमारी मान लो, व्यर्थ सभी अभियान।।


योग दिवस 


जून आज इक्कीस है, योग दिवस के नाम।
चहुँदिश में ही भोर से, यही एक बस काम।।

कोटा  पूरा  हो  रहा, योग  दिवस  पर  आज।
कौन आज खाली भला, सबको ढेरों  काज।।

योगसूत्र  देता  हमें,   मधुरिम  जीवन  ज्ञान।
जिसे समझ में आ गया, वही बड़ा विद्वान।।

करता है नित योग जो, रहता सदा निरोग।
रहता  इससे  दूर जो, वही  रहा  है  भोग।।

हमें तनावों से  अगर, रहना  कोसों  दूर।
करो दोस्ती योग से, बिन माने  मजबूर।।

आप योग अपनाइए, चित्त रहे खुशहाल।
दवा-वैद्य का सदा ही, सारा  दूर बवाल।।

योग दिवस यमलोक में, मना सफलता साथ।
प्रिए  मित्र  यमराज जी, बने  योग के  नाथ।।

चर्चा  मेरी  हो  रही,    योग  दिवस  पर  खास।
मम प्रियवर यमराज था, फिर भी बड़ा उदास।।

पत्र भेज यमराज ने, किया एक अनुरोध।
मोदी जी यमलोक में, भेजो योग प्रबोध।।


पिता दिवस 


पिता दिवस पर जब नहीं, पिता  हमारे  साथ।
कोई भी नहिं  थामता, अब मुश्किल में हाथ।।

पिता  दिवस पर  याद में, आँखें  सूनी आज।  
आशीषों की छाँव बिन, सभी अधूरे काज।।

पिता दिवस पर हैं दुखी, मम प्रियवर यमराज। 
सभी  पिता  को  ढ़ूँढ़ते,  अपने -अपने आज।।

पिता साथ जब तक रहे, बढ़ती  रही  विरक्ति।
आज साथ जब ना रहे, तब उपजी आसक्ति।।

कौन पिता किसका पिता, यही पिता दर्द। 
सुनकर ऐसे शब्द को, हो जाता  वो सर्द।।        

समय आधुनिक आ गया, मगर  पिता  लाचार। 
बच्चे  अब  कहने  लगे, अनपढ़  और  गँवार।।

समय साथ खोने लगा, पिता शब्द का भाव।
पहले से अब वो अधिक, सहता गहरे घाव।।

बने आज जब हम पिता,  समझ में आया दर्द। 
पिता   सदा   परिवार  का, होते   पूरा   फर्द।।

आँसू छिपा के हँस रहा, कहें पिता हम लोग।
पर कितना हम जानते, जो वो रहा है भोग।।

लड़ता  रहता  है  पिता, अपने  आप  से  रोज।
फिर भी पूरा कब पड़े, हम सबकी जो खोज।।

पिता को हम सब मानते, प्राणी नहीं मशीन।
बस हर पल चलता रहे, बिना हुए ग़मगीन।।


दमन 


इच्छाओं का अब दमन, लगता मुश्किल काम।
नव  पीढ़ी  में  दंभ  का,    फैल  रहा  आयाम॥

दमन हीन की भावना, छोड़ बढ़े जो लोग।
सच मानो पथ छोड़कर, भाग गया है रोग।।

हर  कोई  कहता  फिरे,   दमन  हमारा  रोज।
नाहक  राग  अलापते, करते मृग की खोज।।

लोभ-मोह का कर दमन,  बन क्या है संत।
जीवन का तो एक सा, होना सबके  अंत।।

दमद द्वीव गोवा चलें, घूम के आएँ आज।
मोदी जी ने दे दिया, नया  पर्यटन  ताज।।

आज योग्यता को नहीं, पूरा मिलता मान।
बच्चे जीवन त्यागते, बन  बेबस  अज्ञान।।

बिना योग्यता कूदकर, नेता बनते लोग।
यही बड़ा दुर्भाग्य है, देश रहा है भोग।।


पद


पद  पाकर  मद  ना  करें, यही संत दें सीख। 
आज मिला कल छूटना, झूठा है पद भीख।। 

 मातु-पिता पद में बसा, सारा सकल जहान। 
कलयुग में सबसे बड़ा, सीख लीजिए ज्ञान।। 

 पद रज चाहें देवता, ब्रह्मा  विष्णु  महेश।
मानव कैसे पा सके, हरि के पद का देश।। 

ब्रह्मा  विष्णु  महेश का, पद रज चाहें देव।
पर मानव है चाहता, हमको मिले स्वमेव।।

पद का भला घमंड क्यों, करते हैं हम-आप। 
इसीलिए  तो  हो  रहा,   हमसे  ढेरों  पाप।।

पद  पाकर  मोदी  बने,      भारत  राष्ट्र  प्रधान।
पर करते ना वो कभी, निज पद का अभिमान।।


रोया होगा काल 


पाप धरा जब भी बढ़ा,चीख उठा आकाश। 
रोया होगा  काल भी, होता  देख  विनाश।। 

वज्र पड़ा  जब  न्याय पर, मौन हुआ संवाद। 
रोया होगा काल भी, करूणा का अपवाद।। 

देखा होगा जल मरे, जो  पंद्रह  मासूम। 
रोया होगा काल भी, दृश्य देखता घूम।।

कल की घटना देखकर, रोया होगा  काल।
शर्म उसे भी आ रही, पर क्या करे बवाल।।

स्वार्थ लोभ के चक्र ने, लीले पंद्रह लाल।
बेशर्मी नित देखकर,   रोया होगा काल।।

नयनन   जिम्मेदार  के, हुआ  मोतियाबिंद।
रोया होगा  काल भी, संग  बोल  जयहिंद।।

काल क्रूर जब देखता, जग का हाहाकार।  
रोता होगा तब स्वयं, होकर  वह  लाचार॥ 

कालचक्र जब  थम गया, सुनकर  क्रंदन  तान।  
रोया होगा काल भी, तज कर निज अभिमान॥ 

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

Leave a Reply