सामाजिक

पतियों की हत्या के बढ़ते मामले

भारत में विवाह को केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं बल्कि विश्वास, समर्पण, सहयोग और आजीवन साथ निभाने का पवित्र बंधन माना गया है। भारतीय संस्कृति में पति और पत्नी को एक दूसरे का पूरक समझा गया है, जो जीवन की हर परिस्थिति में एक दूसरे का साथ निभाते हैं। यही कारण है कि विवाह संस्था सदियों से भारतीय समाज की सबसे मजबूत नींव रही है। किंतु बदलते समय में अनेक ऐसे घटनाक्रम सामने आ रहे हैं जिन्होंने इस विश्वास को गहरी चोट पहुँचाई है। हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें पत्नियों पर अपने ही पतियों की हत्या का आरोप लगा। इन घटनाओं ने समाज को झकझोर दिया है और लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर रिश्तों में ऐसा कौन सा परिवर्तन आ गया है कि जीवनसाथी ही जीवन का सबसे बड़ा शत्रु बनता जा रहा है।

इस विषय पर चर्चा करते समय तथ्यों की शुद्धता अत्यंत आवश्यक है। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो पति की हत्या पत्नी द्वारा किए जाने की अलग राष्ट्रीय श्रेणी प्रकाशित नहीं करता। इसलिए पूरे देश के लिए कोई आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है। कुछ स्वतंत्र अध्ययनों और पाँच राज्यों के संकलित मामलों के आधार पर वर्ष 2020 से 2024 के बीच लगभग 785 ऐसे मामले सामने आने का उल्लेख किया गया है, जबकि विशेषज्ञों का अनुमान है कि राष्ट्रीय स्तर पर वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है। इन अनुमानों को अंतिम या आधिकारिक आँकड़ा नहीं माना जा सकता, लेकिन इतना अवश्य स्पष्ट है कि ऐसी घटनाएँ समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुकी हैं।

इन घटनाओं का सबसे बड़ा प्रभाव विवाह जैसी पवित्र संस्था पर पड़ता है। विवाह का आधार विश्वास होता है। यदि पति और पत्नी के बीच विश्वास समाप्त हो जाए तो केवल एक परिवार ही नहीं टूटता बल्कि समाज की मूल संरचना भी कमजोर होने लगती है। जब लोग यह सुनते हैं कि किसी पत्नी ने अपने पति की हत्या कर दी या किसी पति ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी, तो उनके मन में विवाह के प्रति भय और असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है। युवा पीढ़ी के सामने विवाह का आदर्श स्वरूप धुंधला पड़ने लगता है और यह धारणा बनने लगती है कि वैवाहिक जीवन अब पहले जैसा सुरक्षित और स्थिर नहीं रहा।

अधिकांश मामलों का अध्ययन बताता है कि ऐसे अपराध किसी एक कारण से नहीं होते। कई मामलों में विवाहेतर संबंध, पारिवारिक विवाद, आर्थिक तनाव, संपत्ति का विवाद, लंबे समय से चला आ रहा वैवाहिक तनाव, आपसी अविश्वास और प्रतिशोध जैसी परिस्थितियाँ सामने आती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर हत्या के मामलों के उद्देश्यों में भी पारिवारिक विवाद, व्यक्तिगत दुश्मनी, प्रेम संबंध और अवैध संबंध महत्वपूर्ण कारणों में शामिल पाए गए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि परिवार के भीतर पैदा होने वाले विवाद यदि समय रहते नहीं सुलझाए जाएँ तो वे कभी-कभी अत्यंत हिंसक रूप धारण कर सकते हैं।

यह भी समझना आवश्यक है कि हर वैवाहिक विवाद हत्या में परिवर्तित नहीं होता। अधिकांश परिवार कठिन परिस्थितियों के बावजूद बातचीत, समझौते, पारिवारिक सहयोग और कानूनी उपायों के माध्यम से अपने मतभेद सुलझा लेते हैं। इसलिए कुछ जघन्य घटनाओं के आधार पर पूरे समाज या किसी एक लिंग के प्रति नकारात्मक धारणा बनाना उचित नहीं होगा। अपराधी का मूल्यांकन उसके अपराध के आधार पर होना चाहिए, उसके लिंग के आधार पर नहीं।

इन घटनाओं का सबसे अधिक दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। जब किसी परिवार में एक अभिभावक की हत्या हो जाती है और दूसरा जेल चला जाता है, तब बच्चे एक साथ माता और पिता दोनों का सहारा खो देते हैं। उनके सामने आर्थिक, सामाजिक और मानसिक संकट खड़ा हो जाता है। वे लंबे समय तक भय, अवसाद, असुरक्षा और सामाजिक उपेक्षा का सामना करते हैं। अनेक मनोवैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि बचपन में इस प्रकार का आघात व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित कर सकता है। ऐसे बच्चे पढ़ाई, सामाजिक संबंधों और मानसिक स्वास्थ्य में गंभीर कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं।

समाज के स्तर पर भी इन घटनाओं के दूरगामी परिणाम दिखाई देते हैं। जब परिवारों के भीतर हिंसा बढ़ती है तो सामाजिक विश्वास कमजोर होता है। पड़ोसी, रिश्तेदार और मित्र भी वैवाहिक संबंधों को संदेह की दृष्टि से देखने लगते हैं। समाज में अविश्वास का वातावरण बनने लगता है। यह स्थिति केवल पति पत्नी तक सीमित नहीं रहती बल्कि अगली पीढ़ी तक पहुँचती है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं। यदि वे हिंसा, धोखे और प्रतिशोध को सामान्य व्यवहार के रूप में देखने लगेंगे तो समाज में संवेदनशीलता और सहिष्णुता का स्तर लगातार घटेगा।

आज का डिजिटल युग भी रिश्तों को नई चुनौतियाँ दे रहा है। सोशल मीडिया ने लोगों को अभूतपूर्व संवाद के अवसर दिए हैं, लेकिन इसके साथ ही कई नई समस्याएँ भी उत्पन्न हुई हैं। कभी-कभी आभासी संबंध वास्तविक संबंधों पर भारी पड़ने लगते हैं। पति पत्नी के बीच संवाद कम होता जाता है और गलतफहमियाँ बढ़ती जाती हैं। कई बार छोटी बातों को समय रहते सुलझाया नहीं जाता, जिससे तनाव गहराता जाता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल सोशल मीडिया ही अपराधों का कारण है, लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि यदि इसका उपयोग संयम और जिम्मेदारी से न किया जाए तो यह पारिवारिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

भौतिकवादी जीवनशैली भी एक महत्वपूर्ण चुनौती बनकर उभरी है। आज सफलता और आर्थिक उपलब्धि को जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य माना जाने लगा है। व्यस्त जीवन के कारण परिवार के सदस्यों के पास एक दूसरे के लिए समय कम होता जा रहा है। संवाद की कमी धीरे-धीरे भावनात्मक दूरी में बदल जाती है। जब मन की बातें साझा नहीं होतीं, तब संदेह, क्रोध और असंतोष जन्म लेते हैं। यदि इनका समाधान समय रहते न किया जाए तो वे गंभीर विवाद का रूप ले सकते हैं।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत में घरेलू हिंसा और वैवाहिक अपराधों के शिकार पुरुष और महिलाएँ दोनों होते हैं। महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा, दहेज मृत्यु और क्रूरता के मामले भी बड़ी संख्या में दर्ज होते हैं। इसलिए समाधान किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने में नहीं बल्कि पूरे परिवार और समाज में स्वस्थ संबंधों की संस्कृति विकसित करने में है।

यदि किसी पति पत्नी के बीच संबंध इतने खराब हो जाएँ कि साथ रहना असंभव हो जाए, तो कानून ने उनके लिए अलग होने का सम्मानजनक और शांतिपूर्ण मार्ग उपलब्ध कराया है। आपसी सहमति से अलग होना, न्यायालय की सहायता लेना, पारिवारिक परामर्श लेना और कानूनी प्रक्रिया अपनाना किसी भी प्रकार की हिंसा से कहीं बेहतर विकल्प हैं। किसी भी परिस्थिति में हत्या न तो समस्या का समाधान है और न ही किसी प्रकार से उचित ठहराई जा सकती है।

समाज को इस दिशा में कई स्तरों पर कार्य करना होगा। सबसे पहले परिवारों में संवाद की संस्कृति विकसित करनी होगी। पति पत्नी को एक दूसरे की बात धैर्यपूर्वक सुनने और समझने की आदत विकसित करनी चाहिए। विवाह पूर्व और विवाहोपरांत परामर्श सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए ताकि दंपति संबंधों की वास्तविक चुनौतियों को समझ सकें। परिवार के बुजुर्गों को भी केवल निर्णय सुनाने के बजाय मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाहिए।

शिक्षा व्यवस्था में भी नैतिक मूल्यों और भावनात्मक शिक्षा को अधिक महत्व देना होगा। बच्चों और युवाओं को केवल परीक्षा और रोजगार की तैयारी नहीं बल्कि संवाद कौशल, क्रोध नियंत्रण, सहानुभूति, पारस्परिक सम्मान और संघर्ष समाधान जैसे जीवन कौशल भी सिखाए जाने चाहिए। यदि अगली पीढ़ी भावनात्मक रूप से अधिक परिपक्व होगी तो भविष्य में ऐसे अपराधों की संभावना भी कम होगी।

कानूनी व्यवस्था को भी प्रभावी बनाना आवश्यक है। हत्या जैसे मामलों की निष्पक्ष और शीघ्र जाँच होनी चाहिए। दोषियों को समय पर न्यायालय से दंड मिले ताकि समाज में कानून के प्रति विश्वास बना रहे। साथ ही निर्दोष व्यक्ति को किसी भी प्रकार के झूठे आरोप से बचाना भी उतना ही आवश्यक है। न्याय तभी सार्थक है जब वह निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध हो।

मीडिया की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अपराधों को सनसनी बनाकर प्रस्तुत करने के बजाय उनके सामाजिक और मानवीय परिणामों पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। यदि समाचारों में केवल रोमांच और सनसनी दिखाई जाएगी तो समाज समस्या की गंभीरता को सही रूप में नहीं समझ पाएगा। मीडिया को समाधान, जागरूकता और पारिवारिक मूल्यों को भी उतना ही महत्व देना चाहिए।

अंततः यह कहा जा सकता है कि पति की हत्या पत्नी द्वारा किए जाने के मामले हों या पत्नी की हत्या पति द्वारा, दोनों ही समाज के लिए समान रूप से गंभीर और दुखद हैं। उपलब्ध अध्ययनों में पिछले पाँच वर्षों के दौरान लगभग 785 मामलों का उल्लेख पाँच राज्यों के संदर्भ में मिलता है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर इस विषय का अलग आधिकारिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है। फिर भी प्रत्येक ऐसी घटना इस बात का संकेत है कि कुछ परिवारों में संवाद, विश्वास और संवेदनशीलता का संकट गहराता जा रहा है।

यदि समाज समय रहते इस चुनौती को गंभीरता से नहीं लेता तो इसका परिणाम केवल अपराधों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सबसे बड़ा नुकसान विश्वास, परिवार और सामाजिक एकता को होगा। रिश्तों में प्रेम की जगह संदेह, सहयोग की जगह संघर्ष और संवाद की जगह हिंसा ले सकती है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि परिवारों को मजबूत बनाया जाए, नैतिक मूल्यों को पुनर्जीवित किया जाए, कानूनी व्यवस्था को प्रभावी बनाया जाए और हर व्यक्ति को यह समझाया जाए कि किसी भी मतभेद का समाधान हिंसा नहीं बल्कि संवाद, धैर्य और कानून के दायरे में ही संभव है। यही वह मार्ग है जो समाज को भय और अविश्वास से निकालकर विश्वास, सुरक्षा और मानवीय संवेदनाओं की ओर ले जा सकता है। 

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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