कुण्डलिनी छंद
गर्मी का मौसम कहे, खुद का रखिए ध्यान।
जानबूझकर मत बनो, आप सभी नादान।।
आप सभी नादान, भाव में रखिए नर्मी।
ठंडा रखना माथ, दिखाना तुम मत गर्मी।।४३
रोटी के दो जून की, पापड़ बेलें रोज।
इस दुनिया में भूख ही, मिलती है बिन खोज।।
मिलती है बिन खोज, खूब ताजी अरु मोटी।
कहें मित्र यमराज, चाहिए सबको रोटी।।४४
सरिता सी बहना सदा, मधुर रागिनी संग।
हर प्राणी खुशहाल हो, बहुधा खिलते रंग।
बहुधा खिलते रंग, चाहते सभी अमरता।
करें निवेदन आप, मान लो तुम अब सरिता।।४५
आया ऐसा है समय, सुनता कौन पुकार।
चाहे जितना हों दुखी, खाना ही है मार।।
खाना ही है मार, यही किस्मत है भाया।
कहें मित्र यमराज, सत्य संदेशा आया।।४६
होनी को कब टाल सके, नर का क्या आधार।
बीत रही हर साँस यहाँ, बन कर के अंगार।।
बन कर के अंगार, जलाए तन-मन टोनी।
कौन करे उपचार, समझिए जो है होनी।।४७
ज्ञानी मुनि जन सब कहें, करो सदा सत्कर्म।
ईश्वर करुणा मानकर, समझो जीवन मर्म।।
समझो जीवन मर्म, बात ये हमने जानी।
फिर भी हमको आप, भले मत कहिए ज्ञानी।।४८
चाहें केवल लोग जो, बनना बड़े महान।
पर हिम्मत जिनमें नहीं, कैसे भरें उड़ान।।
कैसे भरें उड़ान, सिर्फ हैं भरते आहें।
केवल उनका स्वप्न, सोचते जितना चाहें।।४९
मोबाइल के दौर में, तनहाई का भाव।
बात अलग यह और है, देता गहरा घाव।।
देता गहरा घाव, छीन सबका इस्माइल।
फिर भी भाए खूब, आप हमको मोबाइल।।५०
हम सब काँपें क्यों भला, रक्तदान के नाम।
हानि न तन को करे, डरने का क्या काम।।
डरने का क्या काम,पुण्य यह प्रत्यक्ष सुगम।
दूर करें मन भ्राँत, रक्त दें खुलके सब हम।।५१
हम सब काँपें क्यों भला, रक्तदान के नाम।
करते हैं खिलवाड़ भी, निज जीवन बदनाम।।
निज जीवन बदनाम, कौन है कब किससे कम।
कहें मित्र यमराज, करेंगे रक्तदान हम।।५२
रक्तदान के नाम पर, काँप रहे हैं लोग।
यह उनका दुर्भाग्य है, या कोई संयोग।।
या कोई संयोग, बने हो क्यों बलवान।
कहें मित्र यमराज, चलो अब करने रक्तदान।।५३
आता मुझको समझ में, उसके मन का भेद।
यही आज का है बड़ा, मेरे मन का खेद।।
मेरे मन का खेद, कौन है इसका दाता।
क्या इसका उपचार, दूर तक नजर न आता।।५४
आज पाप से जो डरे, उसके मौत करीब।
उनके जाते फूट हैं, समझो आप नसीब।।
समझो आप नसीब, पाप को मानो साथी।
पापी हैं जो लोग, समझिए उनको हाथी।।५५
करते जो हैं पाप, वही बनते हैं नायक।
उनको दुनिया आज, मानती है अभिभावक।।
मानती है अभिभावक, सभी तो उनसे डरते।
लूट-पाट कर नित्य, पेट अपना वो भरते।।५६
ईश्वर भी है जानता, क्या मानव दरकार।
जीते हैं हम जानकर, क्षण भंगुर संसार।।
क्षण भंगुर संसार, चाहते अपना घर भर।
केवल हमको आप, अमरता देवें ईश्वर।।५७
काला-गोरा सत्य है, व्यर्थ बजाते गाल।
ये हम सब भी जानते, जीवन है फुटबॉल।।
जीवन है फुटबॉल, दिखाओ खेल निराला।
जो करते उपहास, करो उनका मुँह काला।।५८
चाहत सबकी मोक्ष है, बिना किए कुछ कर्म।
स्वार्थ लोभ की लालसा, बड़ा सभी का धर्म।।
बड़ा सभी का धर्म, भेजते सबको लानत।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ मोक्ष की चाहत।।५९
हमको ऐसा लग रहा, मैं सबसे मजबूर।
पिता दिवस पर आज जब, वो ही हमसे दूर।।
किसे सुनाऊँ हाल, आप बतलाओ मुझको।
किया आपने दूर, कौन दुलराये हमको।।६०
पैसा और प्रभाव को, सभी रहे दे भाव।
जिनके एक न पास है, उनको कहाँ अघाव।।
उनको नहीं अघाव, लगे सब उनको ऐसा।
इतना रखें प्रभाव, मरेंगे लेकर पैसा।।६१
पैसा बोले जोर से, दे प्रभाव हुंकार।
दोनों मिलकर आदमी, बना रहे बटमार।।
बना रहे बटमार, नीति समझो है कैसा।
सच को करे लबार, झूठ का ओढ़े पैसा।। ६२
जीवन नित बहता रहे, निर्झर बने प्रवाह।
बाधाओं के बाद भी, निकले कभी न आह।।
निकले कभी न आह, सदा हो सभ्य सुसाजन।
ईश कृपा मम शीश, धरा पर जब तक जीवन।।६३
जिसको चस्का नशा का, अमृत लगता व्यर्थ।
चाहे जितना ज्ञान दो, नहीं समझता अर्थ।।
नहीं समझता अर्थ, सामने लाओ उसको।
करते हैं सम्मान, अलग मानते जिसको।।६४
मादकता की आड़ में, उलझ रहे क्यों लोग।
सुरा-सुंदरी फेर में, करते क्या-क्या भोग।।
करते क्या-क्या भोग, मगर वो कहाँ समझता।
उसको लगता आज, श्रेष्ठ सबसे मादकता।।६५
रुकते हैं कब पाँव, भीगती वर्दी सारी।
जाने सारा गाँव, लदी चिट्ठी बहु भारी।।
लदी चिट्ठी बहु भारी, लोग भी राहें तकते।
धूप-छाँव बरसात, कदम मेरे क्यों रुकते।।६६
मर्यादा ने खो दिया, अब तो अपना भाव।
इसीलिए तो टीसता, रहता इसका घाव।।
रहता इसका घाव, करे क्यों रोज तगादा।
कहें मित्र यमराज, बड़ा मूरख मर्यादा।।६७
चाहेंगे जब आप खुद, होता तभी सुधार।
नाहक जब मन में नहीं, चले वृथा तकरार।।
चले वृथा तकरार, आप जैसा गायेंगे।
कहें भला हम आप, नहीं जब तक चाहेंगे।।६८
