डिफॉल्ट

रोला छंद



अपना करो विकास, करो जमकर मनमानी। 
ऐसा हुआ समाज, सुनें  हम  आप कहानी।।
पहले   भरना   जेब,  देश   की पीछे  छोड़ो।
निहित स्वार्थ में आप, मित्र हर धारा मोड़ो।।१११

सुविधा है अब आज, चाह से भी जब ज्यादा।
बिना किए कुछ काज,  ढेर सा मिले लबादा।।
कहें  मित्र  यमराज,  मनुज  की देखो दुविधा।
केवल  अपनी जीत,  चाहता केवल  सुविधा।।११२

दुविधा में है आज, फँसा मानव है दिखता।
चाहे दूजा हार, भाव  निज  नूतन  रखता।।
कहें मित्र यमराज, मानकर  इसमें सुविधा।
इसके उलटा होत, चाहता  जो है  बहुधा।।११३

सुनता कौन पुकार, कहें किसकी बलिहारी।
या केवल संतोष,  पड़े जो भी  अब  भारी।।
कहें मित्र यमराज,  सुनाओ नहीं किसी को।
मानो  मेरी  बात,    नहीं भूलो तुम इसको।।११४      

करना क्यों फरियाद, हमें क्यों इतना गिरना।
रखिए हरदम याद, मान हो अपना जितना।।
कहें  मित्र  यमराज, भला क्या सबसे डरना।
मर्यादा  के  साथ, हमें  मन अपनी  करना।।११५

खोते  सारे  भाव, आज  बस  रुपया  दिखता।
इसका पुण्य प्रताप, वहीं तक रिश्ता टिकता।।
कहते  हैं  यमराज,   ग़ज़ब  रुपए  की  माया-
इसके  आगे  आज,  मनुज है  मारा फिरता।।११६

समझो  जीवन मर्म, यही  सबका  है  साथी।
करिए  अच्छे काम, स्वयं नहिं बनिए हाथी।।
कहें  मित्र  यमराज, बड़ी  विचित्र  है  माया।
ईश्वर का  उपहार, मान  खुश रहना  भाया।।११७

बनकर इक आलोक,  मिटाना जग अँधियारा।
देना  है  विस्तार,    ज्ञान  की  नवरस   धारा।।
भले अकेला आज,    राह  से  नहीं  भटकना।
बस  मंजिल  की ओर, हमें  चलते  ही रहना।।११८

करें दिखावा लोग, आज का फैशन भारी।
घर में  चाहे भोग, करें  बिन वे  तरकारी।।
पर  ये है अपराध, भला कह सकते कैसे।
रुतबा  ही  हम आप, राह  पाते हैं  जैसे।।११९

कैसे भरें  उड़ान, लोग  जो  कुंठित  होते।
और बैठकर  रोज, व्यर्थ  ही  रोते  रहते।।
प्रिय मित्र यमराज, हार थककर अब बैठे।
समझाना   बेकार, बड़े   जो  रहते   ऐंठे।।१२०

देते हैं उपदेश, अमल बिल्कुल  मत करना।
मान इसे अपराध, आप नाहक मत डरना।।
कहें मित्र यमराज, नाव  सब  अपनी  खेते।
समय काटते लोग,  और क्या तुमको देते।।१२१

दिखता  साफ  विनाश,  सभी सतर्क ही रहना।
दूजा ओर विकास, साथ सब मिलकर चलना।।
जाना  है   किस  ओर,   समझिए   जिम्मेदारी।
व्यर्थ   नहीं  आरोप,  बने  तुम  क्यों  दरबारी।।१२२

ध्वनि प्रदूषण नाम,  आप  हमको  क्यों डरना।
इतना  तो है  ज्ञान, सभी को इक दिन मरना।।
कोलाहल   विज्ञान,    आप   वैज्ञानिक   जानें।
नाहक  हमको  आप,   व्यर्थ आते  समझाने।।१२३

क्षण भंगुर संसार, आप अरू हम सब जानें।
फिर भी  गाते लोग, लोभ  कुंठा  के  गाने।।
कहें मित्र यमराज, मनुज की  लीला न्यारी।
रंगे  हुए   सियार,  सुनाते   सबको   गारी।।१२४

छीने आज सूकून, शोर का जलवा भारी।
ध्वनि प्रदूषण खूब,  निभाएं  जिम्मेदारी।।
कहें मित्र  यमराज, दोष  है नाहक  देना।
बढ़े प्रदूषण रोज, आप-हम  खाएँ छेना।।१२५

जितना  करते  घात, रखें  सब  उनसे  नाता।  
पाप  कमाई  देख, जगत  भी  है  मुस्काता।।  
कहें मित्र यमराज, करें हम कोशिश कितना।  
कलियुग में बेकार,  पुण्य भी झूठा जितना।।१२६

भरते  अपना पेट, सजाते  झूठ  की  गद्दी।  
धर्म-नीति की बात, लगे उन सबको भद्दी।।  
कहे मित्र यमराज, देखकर  मन अकुलाए।  
पुण्य झुकाए शीश, पाप जयकार लगाए।।१२७

करते  जितना  पाप, तना  है  उतना  सीना।
लगता उनको आज, अमर होकर है जीना।।
कहें मित्र  यमराज, देखकर  मन  अकुलाए।
परेशान  सब देव, लाज अब  उनको आए।।१२८

जीवन  है  फुटबॉल,   खेलते   रहिए   हँसकर।
आगे  रहिए  आप, ठसक से  हरदम  डटकर।।
निज अपना  अंदाज, दिखाओ  सदा  निराला।
जो भी  खड़े  विपक्ष, करा दो  दरश  उजाला।।१२९

गर्मी  से  बेहाल,  जगत  के   प्राणी   सारे।
सूर्यदेव  जी  आप,    हमें   मानो   बेचारे।।
कहें मित्र यमराज, कृपा बस इतना करिए।
बढ़ा हुआ जो ताप, उसे अंकुश में रखिए।।१३०

होगा  प्रभु  उपकार,  हमें  मोक्ष  मत  देना। 
करना मत तकरार, क्रोध भले  कर  लेना।। 
कहें मित्र यमराज, ध्यान बस इतना रखना। 
रिश्वत  चाहे  आप,    धाम  मेरा  ले  लेना।।१३१

श्रम  ही  इनका  काम,    विवश  रोते  बेचारे।
खड़ी  सामने  भूख,   दिखें  रातो-दिन  तारे।।
करते दिन भर काम, समझ विवशता अपनी।
पीटें  अपना  माथ, मानकर अपनी  करनी।।१३२

देखें  बारिश  राह,  सभी  टकटकी  लगाए।
कैसे  रोपें  धान,  कृषक हैं अति  मुरझाए।।
इंद्रदेव  जी  आप, ध्यान  इतना  बस  दीजै।
रिश्वत  की यदि चाह, बताकर हमसे लीजै।।१३३

कहाँ छिपी  हो आप, बताओ  बरखा  रानी।
बहुत हुआ अब खेल, नहीं करिए मनमानी।।
निर्मोही  क्या  शर्म, तुझे अब भी  नहिं आई।
या फिर हम सब आज, मरें खा जहर दवाई।।१३४

पुस्तक  सम नहिं  मित्र, जगत  में कोई दूजा। 
बिन  बोले  दे ज्ञान, करे  जो  पुस्तक  पूजा।। 
बुद्धि कपाल  उधार, तिमिर  को  दूर भगाए। 
कागज की ये नाव, मनुज का भाग्य बनाए।।१३५

रोया  होगा  काल,    देख  नर की सब  पीड़ा।
जाने  कैसा  आज, डसा जगती  को  कीड़ा।।
सूखे  अधरों  देख, लगे  नीरस  अब  जीवन।
काँप उठें तब लोग, व्यर्थ लगता अब सीवन॥ १३६ 

बस्ती  जलती  देख,   काल  भी  रोया  होगा।
जिसकी  ना  उम्मीद, वही सब  होना  होगा।। 
बना देखता मूक, व्यथित  सोचे  क्या करना।  
आँख भरी है नीर, उचित क्या यों ही मरना॥१३७

जीवन कब आसान, आप हम समझें जितना। 
सहता है  जो दंश, पूछिए  मुश्किल  कितना।। 
जिनके  भरे हैं  पेट, लगे  सब  उनको  खेला। 
जिनको लगती भूख, समझता वो जग रेला।।१३८

अनानास  संदेश,     आपका  जीवन  ऐसा।
काँटे दिखें  हजार, हृदय हो मक्खन जैसा।।
कहें  मित्र  यमराज, बनो इक  आप  नजीर।
जरा-जरा सी बात, कभी क्यों होते अधीर।।१३९

रुकें  न  मेरे   पाँव,      भीगती   वर्दी   सारी। 
जाना  सारे  गाँव,    लदी  चिट्ठी  बहु  भारी।। 
जन-मन की उम्मीद, लिए सुख-दुख संदेशा।
धूप-छाँव  बरसात,   नहीं  बदले  परिवेशा।।१४०

छोड़ो   चिंता   आप,    भूल   जाओ   मर्यादा।
कहाँ  फँसे हो  यार,    नहीं  था  कोई  वादा।।
जिसको इसकी फिक्र, उसे तुम भले फँसाओ।
और   बैठकर   दूर,  मजे   से   गाना   गाओ।।१४१

जीवन को  आधार, अन्न ही  सबके  देता।
मन का जुड़ता तार, हमारा  रिश्ता खेता।।
अन्न और मन साथ, सभी के लिए जरूरी।
जिसकी जैसी सोच, संग भी है  मजबूरी।।१४२

करें  नहीं  तकरार,  भूल  अपनी  स्वीकारें।
होता  तभी  सुधार, उसे जब आप सुधारें।।
कहें मित्र यमराज, सभी  के हित  में होगा।
नहीं मिले उपहार, बढ़ाना फिर क्यों रोगा।।१४३

करिए  आप  विचार,   बात  मेरी  भी  मानो।
होगा तभी सुधार, स्वयं  को जब  पहचानो।।
कहें  मित्र  यमराज, सुखद है  जीवन जीना।
कभी-कभी तो आप, पड़ेगा विष भी पीना।।१४४


सावन


लेकर  इक  उम्मीद,  दूर  से  आए  बादल।
फैला नव  उल्लास, मिटेंगे  सारे  काजल।।
अब होगी बरसात, खेत  का काम  बढ़ेगा।
सुंदर सा परिदृश्य, सभी को नया दिखेगा।।१४५

मोर   नाचते   द्वार,  पपीहा   गीत   सुनाए। 
धरती ओढ़े चीर, गगन  भी शीश  झुकाए।। 
कहें मित्र  यमराज, मगन है  सारी  दुनिया। 
उछल-कूद कर खूब, खेलते मुन्ना मुनिया।।१४६

टप-टप   टपके  नीर,  झूमती   डाली-डाली।
भीगी सारी पीर, खिली मन  की हरियाली।।
कहें मित्र  यमराज, प्रकृति का  सुंदर गहना।
मोहक सी मुस्कान, और आगे क्या कहना।।१४७

पैसा और  प्रभाव,  आज के  सब हैं  मारे।
जिसको नहीं अभाव, मानते कब बेचारे।।
कहें  मित्र  यमराज, बने  वो  खुदा  घूमते।
मौका  पाते  एक, भला  ये  कहाँ  चूकते।।१४८

करते   रहिए   जाप, मिलेगा   प्यारे   पैसा।
बढ़ेगा  तब  प्रभाव, नाम  भी  होगा  वैसा।।
कहें  मित्र  यमराज,  जमाना  देता  इज्जत।
मौका देकर खूब, भीड़  करती  है  हुज्जत।।१४०

लेतीं रुप  विकराल, अधिकतर  आगजनी में। 
कच्चे-पक्के  घर बार, झुलस जाते हैं इसमें।। 
पूँजी  जलकर  खाक,  बेबसी  पड़ती  भारी। 
ईश्वर  का  है  कोप,  कहे  ये  दुनिया  सारी।।१५०

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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