ग़ज़ल
हर गरीब का बच्चा भूखा बैठा भोजन पाने को
पांच किलो राशन मिलता है सबको भूखमिटाने को ।
रोटीका कोई सवाल न करना देशवासियों तुम ,
तुम तो आये ही हो धरती पर भूखे मर जाने को।
गांव गली व चौराहों पर जनता भीड़ लगाये,
देख रही टकटकी बांधकर अपने हुक्मरानों को।
पूंजीपति नेता अफसर संग मौज़ मनाते रहते हैं,
लूट-लूट अपने घर भरते खाली किये खजाने को।
किसे पता भीतर-भीतर क्या कुछ होता रहता है,
दरबारों की मनसबदारी सारा माल लुटाने को।
सदियों से आजिज है जनता झेले अनगिन दुःख,
कैसे-कैसे नेता आये अपना देश चलाने को।
देख चुके हो बहुत तमाशा अब जनमत तैयार करो,
बिगुल क्रांति का फूंको अब तो अपना देश बचाने को।
— वाई. वेद प्रकाश
