रिश्तों में अपनापन ढूंढें
रिश्ते बहुत नाजूक होते हैं,
क्या खोया है क्या पाया है,
आत्म परिक्षण करके अपना,
रिश्तों में अपनापन ढूंढें ।
बचपन और जवानी तो क्या,
वृद्ध अवस्था में भी अपने ,
अपनों में अपनापन ढूंढें,
रिश्तों में अपनापन ढूंढें।
शर्म हया भी कहीं खो गईं,
कटुताओं के बीज बो गई,
कैसे कोई स्नेह को ढूंढें,
रिश्तों में अपनापन ढूंढें।
मतलब की दुनिया है सारी,
दुविधाओं में फंसी है सारी,
खारे में मीठापन ढूंढें,
रिश्तों में अपनापन ढूंढें।
बेइमानी ओर चोरबाजारी,
चारों तरफ़ फैली बिमारी ,
स्वार्थ त्याग कर सच को ढूंढें,
रिश्तों में अपनापन ढूंढें।
मानवता भी कहीं खो गई,
कुंठाओं की बलि चढ़ गई ,
कैसे अब मानवता ढूंढें ,
रिश्तों में अपनापन ढूंढें।
फिर भी इसमें बंधन ढूंढें,
प्रयत्नो से ही मोहनी,
मिल जाए कुछ प्रेम की बूंदें,
रिश्तों में अपनापन ढूंढें।
— कालिका प्रसाद सेमवाल
