कविता

ऐसा इन्हें भगवान् चाहिए

ज्ञान नहीं जो पोथी में।
ज्ञान वही जो ज्योति में।
स्मृति नहीं जो वीथि में।
स्मृति वही जो रीति में।

ज्ञान के नाम विछा वितंडा।
तर्क-वितर्क से होता ठंडा।
मार-काट यहाँ मच जाती है,
पहले थी मुर्गी या पहले अंडा।

नहीं किसी को ज्ञान चाहिए।
धन, पद और सम्मान चाहिए।
बिना किए सब कुछ दे जाए,
ऐसा इन्हें भगवान् चाहिए।

ज्ञान वही जो चेतन में।
संग्रह होय अवचेतन में।
मृत्यु का आभास कराए,
मानव जीए अचेतन में।

ज्ञान की देखो राह निराली।
जिसने ज्योति से ज्योति जलाली।
ज्ञान कर्ममय हो जाता है,
वरना राह अज्ञान ने पाली।

राष्ट्रप्रेमी स्वयं का माली।
देता नहीं किसी को गाली।
ना आरोप, नहीं शिकायत,
यात्रा रूपी मंजिल पाली।

डॉ. संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

जवाहर नवोदय विद्यालय, मुरादाबाद , में प्राचार्य के रूप में कार्यरत। दस पुस्तकें प्रकाशित। rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in मेरी ई-बुक चिंता छोड़ो-सुख से नाता जोड़ो शिक्षक बनें-जग गढ़ें(करियर केन्द्रित मार्गदर्शिका) आधुनिक संदर्भ में(निबन्ध संग्रह) पापा, मैं तुम्हारे पास आऊंगा प्रेरणा से पराजिता तक(कहानी संग्रह) सफ़लता का राज़ समय की एजेंसी दोहा सहस्रावली(1111 दोहे) बता देंगे जमाने को(काव्य संग्रह) मौत से जिजीविषा तक(काव्य संग्रह) समर्पण(काव्य संग्रह)