मुक्तक/दोहा

दोहा

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उत्सव 

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उत्सव  मेरे  संग  में,     मना  रहे  यमराज।

भूले अति उत्साह में, आए थे जिस काज।।

बिटिया रानी के जन्म पर, उत्सव सा माहौल।

विदा हुई जब एक दिन, हृदय  रहा है खौल।।

अब उत्सव में वो नहीं, पहले सा उल्लास।

ऐसा लगता आजकल, होता है परिहास।।

होते उत्सव आड़ में, सिर्फ दंभ के खेल।

आते जाते लोग में, नहीं प्रेम  का मेल।।

उत्सव भी अब बन गए, महज एक व्यापार।

भीतर  सब  रीता पड़ा, द्वार  सजा बाजार।।

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पीड़ा 

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पीड़ा जन-मन  की हरो, मेरे  प्रभु जी राम।

वाणी अरु व्यवहार से, रचें नवल आयाम।।

मातु-पिता को आजकल, कौन दे रहा भाव।

पीड़ा की  हम क्या  कहें, नित्य  कुरेदें घाव।।

बड़ी विकट पीड़ा उठी, चिंतित  है  यमराज।

हाथ जोड़ मुझसे कहे, आप सँभालो काज।।

मेरे  पीड़ा  की  दवा,   मम  प्रियवर  यमराज।

शुभ चिंतक सबसे बड़ा, बाकी व्यर्थ समाज।।

देख हमारी मित्रता, पीड़ित हैं कुछ लोग।

पूछ रहा  यमराज भी, यह कैसा है रोग।।

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उतरन

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उतरन देकर लोग कुछ, जता रहे एहसान।

चर्चा- परिचर्चा करें, मान स्वयं  भगवान।।

अगर किसी का हो भला, यदि उतरन से आप।

वरना रखो संभालकर,   व्यर्थ नहीं कर जाप।।

उतरन को मिलता नहीं, सदा सभी से भाव।

केवल  देते  हैं  वही,   सहते  हैं  जो  घाव।।

उतरन देती है कभी, कुछ लोगों को हर्ष।

वे करते  नाहक  नहीं, झूठ-मूठ  संघर्ष।।

यह तन भी तो एक दिन, होगा उतरन रुप।

किसे पता है कौन कल, सुंदर  बने विद्रुप।।

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शतरंज 

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जीवन  भी  शतरंज  सा, जैसा  ही है खेल।

बुद्धिमान वो ही बड़ा, चलता करके मेल।।

हारी  बाजी  जीतना,   है  शतरंजी  चाल।

जो कुंठित रहते सदा, करते बहुत सवाल।।

राजा-रानी  गिर  पड़े, प्यादा  भी  लाचार।  

यह शतरंजी खेल है, जीत-हार का सार।। 

ऊँचा  चाहे  जो  बने,  गिरना  भी  है  जान।  

नहीं बिसात घमंड की, यही गुरू का ज्ञान॥

सिर पर जो ये ताज है, कल चाटेगा धूल।

चाल  समय की  देखिए, मोहरे देंगे शूल॥ 

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करतूत 

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अपनी ही करतूत को, नहीं जानता कौन।  

फिर भी  बेचारे  बने,    देखो  बैठे  मौन॥

करतूतों का एक दिन, मिलता है परिणाम।  

आप बैर  हो बेचते, दाम मिले  क्यों आम॥

भले छिपाए घूमते, हम  अपनी  करतूत।  

पर सब कुछ हैं देखते, ईश्वर के जो दूत॥

जैसा  बोते  बीज  हो,   पाते  वैसा  उत्पाद।  

दिया खाद पानी नहीं, निश्चित सब बरबाद॥

हर पल अपनी करतूत का, रखता  है जो ध्यान।  

उसके जीवन का सदा, बिल्कुल अलग विधान॥

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बदले नहीं विचार 

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दोष हमारा क्या भला, बदले नहीं विचार।

क्या ठेका  मैंने  लिया, सुधरे  ये  संसार।।

बदले नहीं विचार तो, चिंता की क्या बात।

बीतेगा ये  समय भी, जैसे दिन  औ रात।।

बदले नहीं  विचार का, मत लो  आप तनाव।

मुफ्त बाँटता फिर रहा, कब से नेक सुझाव।।

कोशिश तो ढेरों किया, बदले नहीं विचार।

क्या कोई है इस धरा,  जो दे मुझे सुधार।।

बदले   नहीं   विचार का, प्रश्न   बड़ा   गंभीर।

पर कोई दिखता नहीं, हमको तनिक अधीर।।

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भोर ललित की लालिमा 

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भोर ललित की लालिमा, बिखरें जन मन लाल।  

जैसे  चंदा  की चुनर,         धरती  ओढ़े  गाल॥

भोर ललित की लालिमा, जागे तरुवर डाल।  

पंछी  गावें  रागिनी,     सबके  अपने  ताल॥

भोर ललित की लालिमा, पुष्पित कमल उछाह।  

बूंद-बूंद  की  ओस  में,      मोती  सी  उत्साह॥

भोर ललित की लालिमा, बजते घंटे शंख।।

होती  दीपक  आरती,   उड़ते  पक्षी  पंख॥

भोर ललित की लालिमा, जीवन में नव आस।  

अँधियारा  हारा  चला,   उजियारे  का  वास॥

भोर ललित  की लालिमा,  देती नव  उत्साह।

दिखे धरा पर नव खुशी, संग सुखदा प्रवाह।।       

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दर्द झेलती बेटियाँ

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दर्द  हमारी  बेटियाँ,         झेल  रही  हैं  रोज।

मातु-पिता नित कर रहे, समाधान की खोज।।

जाने कैसा हो गया,  अपना आज समाज 

दर्द झेलती बेटियाँ,  गिरती उन पर गाज।।

घर हो परिवार फिर, डर-डर जीते नित्य।

दर्द झेलती बेटियाँ, यह कैसा औचित्य।।

दर्द   झेलती   बेटियाँ,       पूछें   जीवन   सार।

कृष्ण धरा पर आप लो, आज अभी अवतार।।

दर्द  झेलती  बेटियाँ,       चिंतित  हैं  यमराज।

हाथ जोड़ हमसे कहे, घोल पिया क्या लाज।।

दर्द  झेलती  बेटियाँ,       पूछ  रही  हैं  आज।

जहर पिला कर मार दो, बच जाए मम लाज।।

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धमकी 

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धमकी देकर क्या मिला, इस पर करो विचार।

वरना  होगा  एक  दिन, तव  जीवन  बेकार।।

धमकी देकर पाक नित, बनता है बलवान।

सारी  दुनिया  जानती,  इसका जो ईमान।।

नेता  धमकी दे रहे, खाली  जिनके  हाथ।

किसी तरह से चाहते, सत्ता का हो साथ।।

खाली जिनके हाथ में, बस धमकी हथियार।

बेचारे   मजबूर   हैं,   सुने   नहीं   सरकार।।

धमकी अब देने लगा, मम  प्रियवर  यमराज।

मेरे साथ चलना तुझे, फिर कैसा कल-आज।।

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चिंता चिता समान है

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चिंता  चिता  समान  है,    झूठी  है  ये  बात।

किसकी कटती है भला, बिन चिंता के रात।।

चिंता  चिता  समान  है,  कैसे कहते आप।

मुर्दे  तो  बेखौफ  हैं,  करते  कब  संताप।।

चिंता  चिता  समान  है,  फिर लकड़ी बेकार।

सभी इसी से कीजिए,  अब अंतिम संस्कार।।

कहा मित्र यमराज ने, प्रभु  सब  झूठा  खेल।

चिंता  चिता  समान  है, क्या है इसका मेल।।

चिंता  चिता  समान  है,  बड़ा गूढ़ है राज।

रहें नहीं  इसके  बिना, जैसे हो यह ताज।।

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बिना स्वार्थ  होता, अब  स्वागत  सत्कार।

कलियुग माया देखिए, दें अपने दुत्कार।।

आज कौन करता भला, अब भूलें स्वीकार।

उसको तो आता मजा, बस करना तकरार।।

करते  हम  स्वीकार हैं, जो मेरा अपराध।

यही हमारी है सजा, ईश्वर ले अब साथ।।

आदत पाकिस्तान की, जस कुतिया की पूँछ।

छोड़ नहीं  पाता कभी, भीख  कटोरा  छूँछ।।

अपनी आदत से नहीं, बनो आप  मजबूर।

वरना  होंगे  मित्रवर, अपनों  से  भी  दूर।।

पोषक तत्वों से युक्त हो, हर प्राणी आहार।

प्रभु जी धरा को दीजिए, आप उचित आधार।।

शोषक बनकर भी नहीं, मन को मिला सुकून।

अब भी जीवन का नहीं, समझ रहे मजमून।।

अहंकार तो काँच है, समझे  सारे  लोग।

यही बात तो साँच है, व्यर्थ पालते रोग।।

हृदय  काँच  सा  टूटता,  देता  गहरा  दर्द।

जोड़ बताता है सदा, क्या है इसका सर्द।।

नहीं भटकिए और अब, मन की ऑंखें खोल।

आखिर इतना आपके, चिंतन में क्यों झोल।।

मन की ऑंखें खोलना, बड़ी जरूरत आज।

भावावेशी मत बनो, समझो  इसका राज।।

करते  पूजा-पाठ  जो,   मान  रहे  अनमोल।

जो भी करना है करें, मन की ऑंखें खोल।।

मन की ऑंखें खोलकर, करो सत्य का बोध।

वरना जीवन  में सदा, होगा  नित अवरोध।।

लगा  लिया  है  आपने,  मोटा  ताला  एक।

मन की आँखे कैद में, यह कैसा अविवेक।।

आज  भद्र  इंसान  को, पूछ  रहा है  कौन।

माफी के संग सिर्फ है, उसके हिस्से मौन।।

मन में देखो झाँक कर, देखो अपने पाप।

राम दान को लूटते, करके  माला  जाप।।

पाक-साफ कितना हुए, मन में देखो झाँक।

या फिर घर में बैठकर, पाप को अपने टाँक।।

मन  में  अपने  झाँकना,  जो  करते  स्वीकार।

यही बड़प्पन मनुज का, आज समय दरकार।।

मन में देखो झाँककर, और करो बदलाव।

कहें मित्र यमराज जी, केवल नेक सुझाव।।

करते रहिए कर्म शुभ, मन में रख विश्वास।

ईश्वर की होगी कृपा, नहीं छोड़िए  आस।।

चंदा  चोरी  कर्म  का,    करते  व्यर्थ  बखान।

कलयुग महिमा का नहीं, आप दीजिए ज्ञान।।

कर्म का दीपक जो जले, बुझे न मन की आस।  

ईश्वर देता साथ है, रखिए  उस  पर  विश्वास।।  

चंदा  मांगें  भाग्य का, जो  बैठे  कर  आस।  

कर्महीन की नाव का, डूबे बिन जल वास।।  

कलयुग केवल नाम का, मनुज करे यदि काज।  

नीति-धर्म  संग  कर्म से,    बदले  सारा  साज।।

समय देखकर बोलिए, तोल-मोल कर बात।  

मधुर वचन से जीतिए, वरना  पड़ते। लात।।  

कायर बनने से भला, बनता किसका काम। 

अच्छा है घर बैठकर, आप लड़ाओ जाम।।

उलझाओ खुद को नहीं,चुनिए सहज विकल्प। 

नहीं किसी को बोध हो,  ज्ञानी हो तुम अल्प।।

देख विषमता रो रहे, निर्बल अरु असहाय। 

बड़ी वेदना  हृदय की, ईश्वर  रहा  रुलाय।।

असमय कभी न बोलिए, नहीं बघारो ज्ञान। 

नाहक में कटुता बढ़े, अरु होगा अपमान।।

अब असत्य का जोर है, यही आज की नीति।

झूठ-मूठ  दिखला रहे,   लोग आपसे  प्रीति।।

बेंचा  खुद  ईमान है,    मुझे  न  कोई  द्वंद्व।

फिर क्यों करते आप हैं, घर बैठे छलछंद।।

यमराज मित्र के दोहे 

मेरे  ही  ईमान  पर, प्रश्न  उठाते  आप।

नादानी में कर रहे, जानबूझकर पाप।।

ठेका  मैंने  ले  लिया,   बेंचों  सब  ईमान।

पाओगे मौका नहीं, मुफ्त धर्म का ज्ञान।।

क्या  अचार  है  डालना,  दीन  धर्म  ईमान।

बस थोड़ा सा आपको, रहे लोग सब जान।।

नादानी   हमसे   हुई,    बेच   दिया   ईमान।

कल तक मैं कहता रहा, मुझे बहुत सद्ज्ञान।।

सदा  खड़ा हो  सामने,   कर्मों  का  परिणाम।

समय साथ इसका बड़ा, दिखता है आयाम।।

कर्मों के परिणाम का, जिसने समझा सार।

ज्ञानी वो  ही है  बड़ा, नहीं समझता भार।।

मिले  हमेशा  आपको, जैसा है  निज  धर्म।

परिणामों से जानिए, अब-तक जैसा कर्म।।

आये दिन बरसात के, कृषकों में उत्साह।

बढ़ जायेगा शीघ्र ही, खेती कर्म  प्रवाह।।

आये दिन बरसात के, गर्मी  जाती  दूर।

भीग रही जैसे धरा, वो होती  मजबूर।।

जनमानस  बेचैन है, मिल  नहीं  सुख-चैन।

आये दिन बरसात के,  सुख के  भीगे रैन।।

सुधीर श्रीवास्तव 

गोण्डा उत्तर प्रदेश 

अपनों को बिसरा रहे, आज जगत की रीत।

अपने-अपने  स्वार्थ  में,  गाते  झूठे   गीत।।

प्रीत  नहीं रखना कभी, जाने बिना चरित्र।

धोखा खाने से भला, रहो  अकेले  मित्र।।

सूत्र जीत का दे गए, प्रिए मित्र यमराज।

बिन बाधा  के हो रहे, मेरे  सारे  काज।।

कौन आपका मीत है,   नहीं आपको बोध।

स्वयं आप सबसे बड़े, जीवन में अवरोध।।

गाओ अपने गीत सब, बिना किसी सुर-ताल।

औरों  का  मत  देखिए, झूठे  सभी  मलाल।।

खोटी किस्मत दीन की, इसमें किसका दोष।

व्यर्थ निकालें हम सभी, ईश्वर पर निज रोष।।

भले हमें  है लग  रहा, खोटी  किस्मत  दीन।

पर खुद वो माने नहीं, कभी स्वयं को हीन।।

खोटी किस्मत दीन की, इसमें  भी  उपदेश।

भला मानता वो कहाँ, जीवन कोई  क्लेश।।

खोटी किस्मत आड़ में, नफरत का बाजार।

कितना देखा आपने, उसका  जग संसार।।

खोटी किस्मत दीन की, क्यों करते उपहास।

मीठे  बोलो  शब्द  दो,  बिना किसी संत्रास।।

रोटी नहीं नसीब में,  क़िस्मत से जो हीन।

करता  है  संघर्ष  बहु,  पर बेचारा  दीन।।

श्यामा  मेरी  शान  है,  मातु  भारती  शान। 

इससे ज्यादा कुछ नहीं, है मेरा अभिमान।।

नाम जपूँ श्यामा सदा, भारती है मम शान ।  

बंसी बाजे कृष्ण जब, गूंजित आरति गान॥

श्यामा माटी को कहें, मातु भारती शान।  

वीरों की कुर्बानियाँ, करती गौरव गान॥

सारी दुनिया देखती, बढ़े भारती शान।  

श्याम चरण में शीश धर, करें आरती गान॥

सारी  धरती  गा  रही,    राधा-रानी  नाम।  

और तिरंगा देश का, नव भारत आयाम।।

पावस  आई है  धरा, हरियाली  के  साथ।  

सूखे हृदय में जागी, आभा जग के माथ॥

मानव भी  अब आजकल, उड़ते  बने  जहाज।

मान  रहे  वो  गर्व  से,   उनका  आया   राज।।

चाह रहे यमराज भी, इतनी सुविधा आज।

पर उनको  कोई नहीं, देता  एक  जहाज।।

उड़ने को  यमलोक में,  हुआ जहाज प्रबंध।

मोदी जी के साथ में, अभी-अभी अनुबंध।।

सुख-दुख को हम मानिए, मत कीजै मनुहार।

धर्म-कर्म  करिए  सदा,   बाकी  ईश्वर  सार।।

जीवन में सुख -दुख सदा, होते बच्चे मीत।

सबसे ज्यादा दें हमें, अपनेपन  की  प्रीत।।

जीवन कागज नाव है,  देगी जब तक  साथ।

नहीं किसी को है पता, छोड़ जाय कब हाथ।।

पालक हैं ईश्वर-पिता, रखिए इतना ध्यान।

इनके  आगे  फेल है, दुनिया  का विज्ञान।।

पालक संग पनीर में, नहीं रहा वो स्वाद।

जब से गायब हो रहा, पशुधन देशी खाद।।

मौन छोड़ अब कीजिए, कुछ तो आप विचार।

बस  इतना  अनुरोध  है,  सुनो  मेरे  करतार।।

सतगुरु ही करतार हैं, मम जीवन आधार।

उनकी पाकर मैं कृपा, समझा जा दातार।।

अब का मानव मानता, खुद को  ही करतार।

वाणी और व्यवहार का, नहीं समझता सार।।

नीति  नियम  सिद्धांत  का,  भूले  सभी  विचार।

कुत्सित मन की भावना, निहित स्वार्थ आधार।।

धर्म -कर्म सब ताक पर, बस माया का शोर। 

अंतरमन  आवाज भी, हुई बहुत  लतखोर।।

गुरु-कृपा  से  बुझ  रहा, माया  का  अँधियार।

 सत पथ दिखलाकर हमें, करते भव से पार।।

शीश  झुका  अरदास  है,   चरनन  बारंबार। 

कहें मित्र यमराज भी, लाज रखो सरकार।।

बिना समर्पण कुछ नहीं, सफल किसी का काज।

जितना  मर्जी  कीजिए,     उतनी  गिरती  गाज।।

यदि मन की हो  साधना, ईश्वर भी दे  साथ।

सभी   खुशी से  चाहते, थामें   तेरा  हाथ।।

अब  आस्था के साथ नित, होता है खिलवाड़।

नहीं पता  कल को  गिरे, कोई  बड़ा   पहाड़।।

अब मानव की  भावना, रही जहर पी रोज।

कारण इसका है पता, व्यर्थ रहे सब खोज।।

नहीं जीत की राह भी, होती है आसान।

मिलती है केवल उसे, जो लेता है ठान।।

पक्ष-विपक्ष में है ठनी, आपस में ही रार।

दोनों  में कोई  नहीं, मान  रहा  है  हार।।

सुख-दुख को हम मानिए, मत कीजै मनुहार।

धर्म-कर्म  करिए  सदा,   बाकी  ईश्वर  सार।।

जीवन में सुख -दुख सदा, होते बच्चे मीत।

सबसे ज्यादा दें हमें, अपनेपन  की  प्रीत।।

जीवन कागज नाव है,  देगी जब तक  साथ।

नहीं किसी को है पता, छोड़ जाय कब हाथ।।

पहले हम अपना करें, मन के भाव पवित्र।

तब ही  हम  आगे  बढ़ें, लेने  दूजा  चित्र।।

कहा  मित्र  यमराज  ने, बनना  तुझे  पवित्र।

तब मैंने हँसकर कहा, मत कर बात विचित्र।।

जन्मभूमि श्री कृष्ण की, मथुरा जिसका नाम।

कुछ  पापी  मन  चाहते,  कैसे  हो  गुमनाम।।

कृष्ण वंश के लोग कुछ, करते हैं बदनाम।

इतने  सत्ता  लालची,  भूले  मथुरा  धाम।।

मथुरा  में  यमराज  से,     हुई  हमारी  भेंट।

चक्कर में अपने फँसा, खाली कर दी टेट।।

सब  झूठे आरोप भी, छीन रहे सुख चैन। 

एक समय  के बाद में, पथरा जाते  नैन।।   

चोरी  के  आरोप  से, धूमिल  धर्म  समाज। 

चरणों में प्रभु राम के, पाप कर्म  का काज।।

आरोपों  के बोझ  से, झुकते  कंधे  रोज। 

सच बोले तो जल उठे, झूठे करते मौज।।

न्यायालय में झूठ की, दिखती मोटी खाल।  

सच कोने में हो खड़ा, खुद से करे सवाल।। 

कहा  मित्र  यमराज  ने,  सब  झूठे आरोप।

कोशिश करके देख लो, नहीं चलेगी तोप।।

यहाँ सभी मेहमान हैं, करें भला क्यों काम।

जैसा  चाहें  सब  करें,    बैठे  हैं   श्रीराम।।

चार दिनों का खेल है, रखिए इतना ध्यान।

नहीं भूलिएगा कभी, यहाँ  सभी  मेहमान।।

माया  बंधन  में  फँसे,   बने  हुए  अंजान।

कौन भला है मानता, सभी यहाँ मेहमान।।

माटी तन का दंभ है, बनते  व्यर्थ महान। 

तव झूठी पहचान है, यहाँ सभी  मेहमान।।

मम प्रियवर यमराज से, करो-जान पहचान।

मत भूलो तुम भी यहाँ, सिर्फ एक मेहमान।।

रिश्ते   ढोये  जा  रहे, जैसे  हों  सामान।

हम ऐसे क्यों हो गये, मुर्दों से लो ज्ञान।।

हमने इतना  कर लिया, जोड़-गाँठ  सामान।

लेकर कुछ जाना नहीं, भूला गुरु का ज्ञान।।

मुर्दा अरु सामान में,  कितना सुंदर मेल।

दोनों ढोये जा रहे, देख जगत का खेल।।

जितना कम सामान के, सफर करें हम लोग।

कहें मित्र  यमराज जी, बने  सुखद  संयोग।।

अपना सब सोचें भला, औरों का नुकसान।

यही आज के मनुज का, है उत्तम अवदान।।

हमको जो कहते बुरा, उन सबका आभार।

यही मित्र यमराज के, जीवन का है सार।।

करो  बहाना  तुम  भले, पर भीतर  लो देख।

मन के भीतर सत्य का, अक्षरशः अभिलेख।।

वादे  पूरे जब  नहीं, किसको  इसका  शोक।

इस  पर  होनी  चाहिए, अब कानूनी  टोक।।

भेष बदलकर भेड़िए, चाह रहे सम्मान।

प्रश्न बड़ा ये आज है, कैसे हो पहचान।।

चिंता इतनी है बड़ी, जिसका नहीं निदान।

लुटते अब भगवान भी,  कौन करे पहचान।।

महल-अटारी से बड़े, नहीं रहे भगवान।

शरणागत पापी भरे, कैसे हो पहचान।।

कोशिश करके देख लो, व्यर्थ तुम्हारा ज्ञान।

बिना किसी गतिरोध के, कैसे  हो  पहचान।।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921