सामाजिक

जातिगत व्यवस्था के दुष्परिणाम

पिछले विचार में हमने बताया कि प्राचीन भारतवर्ष में कर्मगत वर्ण व्यवस्था थी जिसमें चार वर्ण थे : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र और कर्म के आधार पर एक ही परिवार में उनकी संतानों के भिन्न भिन्न हुआ करते थे। सर्व विदित है कि मुसलमान, ईसाई या अन्य पंथ के लोग सनातन धर्म को नहीं मानते और केवल  हिन्दू ही सनातन धर्म को मानते हैं, इसीलिये इस निर्विवाद सत्य को जानना होगा कि हिन्दू धर्म और सनातन धर्म पर्यायवाची हैं, अर्थात दोनों एक ही हैं। कालांतर में बौद्ध, जैन, सिख पंथ के लोग अपने को सनातन से अलग समझने लगे किंतु वो सदैव अपने को हिन्दू मानते रहे हैं। अर्थात हिन्दू एक ऐसे व्यापक समुदाय का नाम है जिसमें सनातन धर्मावलम्बियों के साथ- साथ सनातन धर्म से उत्पन्न हुए सिख, बौद्ध, जैन आदि पन्थ को मानने वाले लोग भी समाहित हैं। 

जाति व्यवस्था के कारण हिन्दू समाज की जीवन पद्यति की सनातनता (continuity) को लोगों के नामों के आगे जोड़े गए जाति सूचक शब्दों (Surname) ने सबसे अधिक हानि पहुंचाई है। राम, कृष्ण से प्रारम्भ होकर चाणक्य, अशोक तक और सूर, तुलसी, मीरा से लेकर रामकृष्ण, विवेकानन्द तक यह परम्परा नहीं थी। पहले कोई भेद भाव, छुआछूत नहीं थी। 

मुग़लों के आक्रमण के बाद ही जन्मगत जाति व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ, साथ ही उनके अत्याचारों के कारण ही समाज में बाल विवाह, सती प्रथा, जौहर प्रथा और मैला ढोने जैसी कुरीतियों ने जन्म लिया। जिन्हें कालांतर में १९स्वीं और २०स्वीं शताब्दी में भारत के महान समाज सुधारकों ने समाप्त करवाया। राजा राम मोहन राय ने 1829 में आंदोलन चलाकर सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित करवाया, ईश्वर चंद विद्यासागर ने जन जागरण द्वारा बाल विवाह का विरोध किया और 1856 में विधवा पुनर्विवाह का अधिनियम पारित करवाया। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती  भी बाल विवाह और जाति प्रथा के विरोधी थे और महिलाओं की शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। इनके अतिरिक्त ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, महादेव गोविंद रानाडे जैसी विभूतियों ने भी महिला सशक्तिकरण का कार्य क्या और 1891 में विवाह की आयु बढ़ाने के लिये ‘सहमति आयु अधिनियम’ पारित करवाया गया।

सभी कुप्रथाओं को तो मिटा दिया गया और जाति प्रथा होने के बावजूद भी हिंदू समाज में आपस में कोई वैमनस्यता नहीं थी और समरसता थी। प्रमाणस्वरूप चाणक्य ने ब्राह्मण होकर स्वयं सत्ता की लालसा न करके एक चरवाहे चन्द्रगुप्त को भारत का सम्राट बनवाया। कृष्ण यदुवंशी (यादव) थे जिन्हें आज भी पूजा जाता है। मुगल और अग्रेज हमें जितना नुकसान नहीं पंहुचा पाये उससे सौ गुना अहित आजादी के बाद जातिगत आधार पर आरक्षण का कानून लाकर हमारी सरकारों ने किया। इस आरक्षण ने तो हिंदू समाज का ताना बाना ही छिन्न भिन्न कर दिया। आज इसी आरक्षण की अफीम चटाकर कृष्ण के वंशज यादव को पिछड़ा कहा जा रहा है और आश्चर्य की बात यह है कि इसमें वे गर्व की अनुभूति भी कर रहे हैं।

आरक्षण ने हिन्दू समाज का बहुत अहित किया है। इसने न केवल हमारी एकता को तोड़ा, बल्कि हमें एक दूसरे का दुश्मन भी बना दिया। वर्तमान में हमारी राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रगटीकरण से जातिगत विद्वेष कम हुआ है और हमारे सौहार्द और समरसता में वृद्धि हुई है। यह भारत के लिये शुभ संकेत हैं। इस समस्या से पूर्ण रूप से निदान पाने का एक मात्र उपाय है कि हमारे नामों के आगे से जाति सूचक शब्दों को हटाने की अनिवार्यता के लिये सरकार द्वारा शीघ्र ही एक कानून बनाया जाय। जिससे सभी लोग बाध्य होकर न्यायालय में शपथपत्र (affidavit) देकर अपने नामों में परिवर्तन करा लें। ऐसा करने से हो सकता है कि लोगों को चार- पाँच वर्ष तक तो एक दूसरे की जातियाँ पता रहें, किंतु भविष्य में सब भूल जायेंगे। जैसे हम अपने कुल की 3 या 4 पीढ़ी से अधिक के बारे में नहीं जानते हैं।

बच्चों को संस्कार न देने के कारण आजकल की युवा पीढ़ी में बहुत से अपने कुल का गोत्र भी नहीं बता पाते। अर्थात् वो अपने पूर्वज (ऋषि) का नाम भी नहीं जानते हैं,  इस कारण समगोत्र में विवाह संस्कार होने और उससे उत्पन्न समस्याओं का खतरा पैदा हो रहा है। इसके निदान के लिए न्यायालय में दिये जाने वाले शपथपत्र में अपनी जाति सूचक उपनाम (Surname) को हटाकर अपने गोत्र का नाम लिखें। इससे भविष्य में हमारी आने पीढ़ियों को अपना गोत्र सदैव पता रहेगा।

– प्रेम चन्द्र शुक्ल

प्रेम चन्द्र शुक्ल

यूको बैंक में प्रबंधक के दायित्व से वर्ष 2011में अवकाश प्राप्त किया 1981 में योग में डिप्लोमा किया 1977 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक द्वितीय वर्ष प्रशिक्षित नगर व जिला स्तर पर विभिन्न दायित्वों का निर्वहन, वर्तमान में लखनऊ उत्तर भाग में परिवार प्रबोधन का कार्य। पता: एमएम 178, सेक्टर डी, अलीगंज, लखनऊ (226024) चल भाष: 7652045355

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