हास्य-व्यंग्य – लेखक की घर में औकात
अगर आप लेखक हैं और आपको पड़ोसी तक नहीं जानता है कि आप लेखक हैं तो बहुत दुख की बात है। कुछ लोग चुपके से लिखते हैं। घर में पत्नी को पता चल जाये तो कोहराम मच सकता है। प्रेम की कवितायें लिख रहे हैं तो मल्लयुद्ध की पूरी संभावना है। प्रेम से सुसज्जित उपन्यास लिख रहे हैं तो महाभारत आपके घर में हो जायेगा।
पड़ोसी थोड़ा ज्वलनशील पदार्थ की तरह होते हैं। अगर आपकी रचना में दम है तो पडो़सी तीक्ष्ण दृष्टि डाल सकता है। अगर पड़ोसी ने तारीफ की है तो आप दोनों का एक दूसरे के यहाँ उठना बैठना है। थोड़ी आलोचना कर दी तो समझिये पड़ोस तक जाते नहीं लेकिन ताक झांक जरूर कर लेते होंगे।
पड़ोसी आपकी रचना पर नजर रखता है तो वह एक सच्चा पाठक की हैसियत रखता है। आपको सच्चे लेखक की हैसियत बनने की पूरी संभावना है। पड़ोसी पढ़ा लिखा नहीं है तो आप कुछ भी लिखेंगे वो खुश रहेगा कि हमारे पड़ोसी बहुत बड़े लेखक हैं।
घर में कुछ लोग जान गये हैं कि आप लिखते हैं तो आपकी की हैसियत घर की मुर्गी दाल के बराबर की होगी। घर से निकली आलोचना बड़े-बड़े आलोचकों को फेल कर सकती है। पत्नी डर के कारण कविता सुन सकती है। जब आप भावविभोर होकर कविता पाठ करेंगे तो सिर उपर नीचे करके आम सहमति की तरह सहमति दे देगी। अंदर से तो आत्मा फट जाती होगी। किसके पल्ले मैं पड़ गयी।
पत्नी को कुछ कहना रहेगा तो उस दिन कविता बहुत तल्लीन होकर सुनेगी जैसे तानसेन की तान बज रहा हो। जान कुर्बान कर देगी। वह भी तारीफों की पुल बांध देगी। कविता जैसे खत्म होती है वैसे ही कड़वा सच सामने आ जाता है। मल्लू के पापा ने तो मल्लू की मम्मी के लिए पांच हजार की साड़ी आनलाइन मंगाये थे। वह चौदहवीं की चांद लग रही है। कहो तो हम भी…।
अरी पगली ! कविता लिखने से थोड़ी कमाई होती है। दिनभर लिखता हूँ। शाम को सब्जी की व्यवस्था कायदे से हो ही नहीं पाता। तुम पांच हजार की साड़ी आनलाइन मंगाओगी। पांच हजार होते तो एक पुस्तक छपवा लेता। एक दो पुरस्कार तो झटक लेता। चिंता न करो। साहित्य लेखन का मैं कीड़ा हूँ। तुम्हें कविता पर बैठाकर आसमान की सैर कराऊंगा। बेचारी का मुंह लटक गया।
अगले दिन कवि महोदय डरते-डरते अपने पत्नी के सम्मुख कविता सुनाने के लिए आसन ग्रहण कर कविता जैसे सुनाने लगे। पत्नी महोदया की भौंहे तन गयी। चेहरा तमतमा गया। होठ की रौनक खत्म सी होती जा रही थी। आंखों से अंगारे बरसने को तैयार थे। तिरछी चितवन से कवि महोदय को घूर रही थी।
कवि को एहसास हो रहा था। आज सचमुच मेरी कविता की आलोचना होने जा रही है। धीरे से कवि ने अपनी बोरिया बिस्तर समेट कर बगल के कमरे में चले गये। कवि ने राहत की सांस ली। कवि को महसूस हुआ जैसे बहुत बड़े हादसा से बच गया। ईश्वर को लाख-लाख शुक्रिया कहा। तब से वह पत्नी को कविता नहीं सुनाई।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
