कुदरत का हिसाब
नदियों के जो पथ दबा, करते रहे विकास।
बाढ़ बनी जब काल फिर, किसका बचा निवास।।
काटा पेड़ों को सदा, पर्वत किए हलाल।
अब पानी ने खोल दी, मानव की हर चाल।।
नदियों पर कब्जे किए, जंगल दिए उजाड़।
तुम्हें सैलाब पूछता, मानव, बड़ा पहाड़।।
धरती सीना चीरकर, धन का किया हिसाब।
आज उसी ने दे दिया, पानी रूप जवाब।।
वन-पर्वत को लूटकर, फिर बोले सरकार।
बाढ़ अचानक आ गई, दोष किसे इस बार।।
नदियाँ-नाले रोककर, करते रहे विकास।
इक बरसाती धार ने, खोल दिया इतिहास।।
प्रकृति बेचकर खा गए, फिर करते उपचार।
तब समझे, जब घर डूबे, जल का असली भार।।
सत्ता सोई चैन से, जनता झेले मार।
कुदरत सदा हिसाब ले, बचे नहीं दरबार।।
पहले जंगल काटकर, फिर देते उपदेश।
बाढ़ बता देती सभी, कैसा है परिवेश।।
धरती माँ को नोचकर, करते अपना मान।
आज सैलाब पूछता, बतलाओ पहचान।।
कुदरत की चेतावनी, समझो अंतिम वार।
अभी नहीं संभले अगर, करना नहीं पुकार।।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
