कविता

गांव का आदमी

उठता है सुबह तड़के
डालता है सिरहाने के नीचे हाथ
निकालता है बीड़ी का बण्डल और लाइटर
जलाता है बीड़ी खींचता है जोर का कश
जैसे मानों एक ही कश में अपने अंदर
समेट लेगा जीवन के दुखों को
चलता है धीरे धीरे अपनी गौशाला की ओर
करता है इकट्ठा गोबर एक टोकरी में
उठाकर सिर पर चला जाता है दूर खेत के कोने में
फैंकता है गोबर के ढेर पर ऐसे जैसे
मानों दूर छिटक रहा हो अपनी परेशानियों को
उठाता है दूध की भरी केनी
चल पड़ता है शहर की ओर
हलवाई को बेचने के लिए
चार पैसे बन जाएंगे परिवार चलाने के लिए
लौट कर पीता है चाय फौजी जग में
लेता है एक एक घूंट ऐसे जैसे
समेटना चाहता हो परिवार के
दुखों को अपने अंदर
नहा धोकर करता है प्रार्थना अपने इष्टदेव से
मिल जाये दिन भर के लिए काम
उठाता है प्लास्टिक के डिब्बे में रखी रोटी
चटनी एक छीला हुआ प्याज साथ में हरी मिर्च
चल पड़ता है सड़क की ओर जहां
ढेर लगा है पत्थरों का
निकालता है झोले में पड़ा हथौड़ा
करता है शुरू पत्थर कूटना
ऐसे चलता है उसका हथौड़ा
मानो कूटना चाहता हो अपनी उलझनों को
शाम को थका हारा पहुंचता है घर
बैठ जाता है टूटी चारपाई पर
फिर निकालता है जेब से बीड़ी का बंडल
एक बीड़ी ही तो है जो देती है
पूरा दिन रात उसका साथ
तभी पुकारती है घरवाली खाने के लिए
हाथ मुंह धोकर पोंछता है गमछे से
जो रहता है उसके कांधे पर
रूखा सूखा जो भी बना खा लेता है
बच्चों के साथ बैठ कर
पाता है अपनेपन का एहसास
सो जाता है फिर चारपाई पर
देखता है छत्त की ओर
नज़र आती है वही बांस की कड़ियाँ
खिड़की से आती ठंडी ठंडी हवा
नींद की आगोश में ले लेती हैं उसको
सुबह उठते ही रहती है फिर
बंडल से निकली एक बीड़ी
उसकी परेशानियों को धुएं के छल्ले
में उड़ाने के लिए तैयार
यही तो है गांव का आदमी
समाप्त हो जाएगी उसकी जिंदगी
काम के बोझ तले दबकर
सबका साथ छूट जाएगा
पर बीड़ी निभाएगी साथ
अंतिम सांस तक!

— रवींद्र कुमार शर्मा

*रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं जिला बिलासपुर हि प्र