कविता

तुम कहाँ चले गए…

तुम कहाँ चले गए…

काश,
तुम मन की बातें कह पाते।
कुछ कहना चाहते थे,
पर तुम्हारे अस्पष्ट शब्दों को
मैं समझ न पाती थी ।
और तुम…
चुप हो जाते थे ।

तुम्हारा मन दुखता होगा,
दुख मुझे भी होता था,
पर शायद
हम दोनों के बीच
मौन ही नियति बन गया था।

आज बार-बार सोचती हूँ-
काश,
तुम्हारी उन अनकही बातों को
मैं अपने मन से सुन पाती।
तुम्हारी आँखों की भाषा,
तुम्हारी अधूरी मुस्कान,
तुम्हारे इशारों में छिपी इच्छाएँ
समझ पाती।

मन कहता है,
शायद तुम थोड़ा और ज़िद करते,
थोड़ा और डटकर कहते,
तो मैं तुम्हारी हर बात
समझ लेती।

तुम बाहर जाना चाहते थे,
थोड़ा खुला आसमान,
थोड़ी खुली हवा
जी भरकर जीना चाहते थे।

डॉक्टर की सलाह मानकर
मैंने तुम्हें रोक लिया।
डर था,
कहीं तुम गिर न जाओ…
और उसी डर ने
तुम्हारी वह छोटी-सी इच्छा
अधूरी छोड़ दी।

काश,
उस दिन तुम्हारा हाथ थामकर
तुम्हें बाहर ले जाती।
शायद
आज यह कसक
इतनी गहरी न होती।

आज भी मन में
बस यही टीस उठती है-
मैं तुम्हारे दर्द को,
तुम्हारी इच्छाओं को,
तुम्हारे मौन को
पूरी तरह समझ ही न पाई।

तुम कहाँ चले गए…
अपने साथ
अनगिनत अनकहे शब्द
और मेरे हिस्से का
यह पछतावा छोड़ गए।

— तृप्ता गुप्ता

*अंजु गुप्ता

Am Self Employed Soft Skills Trainer with more than 27 years of rich experience in Education field. Hindi is my passion & English is my profession. Qualification: B.Com, PGDMM, MBA, MA (English), B.Ed