वह सुबह से शाम करती है
मैंने उसको देखा
नदी के रेत पर
वह रेत ढोती है
सुबह से शाम तक
बिखरे बालों में
चेहरे पर एक बेवसी है
एक सादगी भी ओढ़े है
घर के हालातों से
एक जिद है
कुछ पल की जिंदगी
मेहनत से गुजारना चाहती है
युवा तन और मन है
कुछ गीत गुनगुनाने का
उसका भी हृदय चाहता है
पर लाचारी में वह
सारे गीत भूल गयी है
वक्त ने जो गीत रेतों पर लिखें हैं
बस उन गीतों को ढो रही है
उसी रेत के गीतों में
वह सुबह से शाम करती है
जिंदगी बस यूँ ही
सुबह से शाम करती है
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
