कविता

एक गृहिणी

मैंने एक स्त्री से पूछा
जो गृहिणी है
तुम झेलती हो
घर के कई हिस्सो से
एक कोने में होती है
तुम्हारी सिसकियां
और हिस्सो से
मिलते हैं ताने तुम्हें
तुम रोज जब्त कर लेती हो
जो मिलती है गालियाँ
तुम्हे देखकर
जो घर के लोग दांत पीसते हैं
कह भी नहीं पाती
अपने मन की बातें
बस सहती हो बेखबर होकर
कागज के पन्नों पर
आंसुओं से कहानी लिखती हो
दिनभर मिले तानों को
अपना हिस्सा समझती हो
दुबककर
मुंह में आंचलभर कर
आंसू बहा लेती हो
तुम्हारी इन सिसकियों में
कोई आवाज़ नहीं होती है
फिर पूछा
आखिर बोलो
किस अधिकार से सब सहती हो
वह कुछ न बोली
बस मौन रहने का अधिकार मिला है

— जयचन्द प्रजापति ‘जय’

*जयचन्द प्रजापति

प्रयागराज मो.7880438226 jaychand4455@gmail.com