धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति का अन्तर

अपनी मारीशस यात्रा में एक दिन हम एक दुकान पर पिज़्ज़ा खाने गये। हम ६ बड़े लोग थे। इसलिए हमने तीन अलग-अलग तरह के पिज़्ज़ों का आदेश दे दिया। हमारे पास की एक टेबल पर एक यूरोपीय परिवार बैठा था, जिसमें पति-पत्नी और किशोर वय के बेटा-बेटी थे। उन चारों ने अपनी-अपनी पसन्द के एक-एक पिज़्ज़े का आदेश दिया था।

जब हमारे पिज़्ज़ा आये, तो हम सबने तीनों पिज़्ज़ों से एक-एक टुकड़ा खाया। दो टुकड़े फिर भी बच गये, तो वे भी हमने आपस में बाँटकर खा लिये। लेकिन मुझे यह देखकर भारी आश्चर्य हुआ कि बगल की टेबल पर यूरोपीय परिवार के चारों सदस्यों ने अपनी-अपनी पसन्द का पिज़्ज़ा अकेले ही पूरा खा लिया, उसमें से एक टुकड़ा भी किसी दूसरे परिवारी के साथ साझा नहीं किया।

मेरे सामने दोनों संस्कृतियों का अन्तर स्पष्ट हो गया। हमारी संस्कृति में भोजन ही नहीं, बल्कि लगभग हर वस्तु दूसरों के साथ साझा करके सेवन की जाती है। बचपन से ही हमें यह सिखाया जाता है कि बाँटकर खाना चाहिए। पंजाबी में एक कहावत है- “बंड खाये खंड खाये, कल्ला खाये गू खाये” अर्थात् जो बाँटकर खाता है, वह मानो खाँड़ (या मिठाई) खाता है और जो अकेला खाता है, वह मानो विष्टा खाता है।

ऋग्वेद (मण्डल 10, सूक्त 117, मन्त्र 6) में लिखा है- “केवलाघो भवति केवलादी” अर्थात् अकेला खानेवाला पाप ही खाता है। हमारे भोजन मंत्र में भी कहा गया है- “सह नाववतु सह नौ भुनक्तु…” यानी हम मिलकर कमायें और मिलकर (या बाँटकर) खायें, देश में कोई भूखा न रहे। अकेले खाना केवल पशुओं की विशेषता है। एक कवि के शब्दों में- “यही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे।”

इसीलिए हमारी संस्कृति में मानव ही नहीं, बल्कि चींटी से लेकर हाथी तक प्रत्येक जीव के कल्याण का ध्यान रखा जाता है। पहली रोटी गाय की और अन्तिम रोटी कुत्ते की- यह हज़ारों-लाखों वर्षों से हमारी परम्परा रही है। यह भारतीय संस्कृति की महानता है, जिसकी समानता कोई अन्य संस्कृति कभी नहीं कर सकती, भले ही वे भौतिक विकास में हमसे कितने भी आगे क्यों न बढ़ जायें।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद कृष्ण १, सं. २०८३ वि. (२९ अगस्त, २०२६)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com