कविता

कविता – किराए की ज़िंदगी

ज़िंदगी किराए का मकान है,ठहरना बस कुछ पल है,
आज अपना लगता है जो,कल वही सफ़र है।
न मोह को इतना पालो कि दिल पत्थर हो जाए,
इंसानियत बाँटते चलो,यही जीवन का असल हुनर है।

न धन साथ जाएगा,न महलों का अभिमान,
न पद की ऊँचाई रहेगी,न दुनियाँ का सम्मान।
जब लौटानी पड़ेगी एक दिन जीवन की चाबी,
तब साथ चलेगा केवल कर्मों का हिसाब-किताब।

इसलिए रिश्तों में प्रेम रखो,व्यापार नहीं,
किसी मजबूर के लिए दिल में इंकार नहीं।
जो आँसू पोंछ सके,वही सच्चा धनवान है,
दूसरों के दर्द को समझना ही सच्ची पहचान है।

कल किस मोड़ पर साँसों की डोर थम जाए,
किस पल यह किराए का घर खाली हो जाए।
इससे पहले कि चाबी हाथों से छूट जाए,
हर दिल में अपने व्यवहार की खुशबू छोड़ जाए।

जाते-जाते बस इतनी सी दौलत कमाना,
किसी के चेहरे पर मुस्कान बनकर जाना।
किशन मोह कम रखना और इंसानियत ज्यादा निभाना,
चाबी लौटानी पड़े तो नेकियों का घर छोड़ जाना।

— किशन सनमुखदास भावनानी

*किशन भावनानी

कर विशेषज्ञ एड., गोंदिया