कविता

एक और आजादी चाहिए

एक और आज़ादी चाहिए
सरहदों की जंग तो जीत ली हमने,
मगर घर में ये कैसा कोहराम है?
जिस आज़ादी के लिए बहे थे दरिया खून के,
क्या उसका यही अंजाम है?
हमें चंद सिक्कों में बिकते ईमान से,
एक और आज़ादी चाहिए,
नेताओं के झूठे, खोखले आश्वासन से,
एक और आज़ादी चाहिए,
दफ्तरों की फाइलों में सिसकती न्याय की आस से,
कुर्सी पर बैठे उस खूनी भ्रष्टाचार से,
कागज़ों पर सिमटे विकास के हर ढोंग से,
अब तंग आ चुका है भारत,
हमें इस प्रहार से,
एक और आज़ादी चाहिए,
मज़हब के नाम पर जो नफ़रत की दीवार उठाते हैं,
ईश्वर और अल्लाह को जो आपस में लड़वाते हैं,
उस अंधे चश्मे से,उस धार्मिक कट्टरता से,
इंसानियत को कुचलती इस भयावह विक्षिप्तता से,
एक और आज़ादी चाहिए,
और सुनो,जो सबसे बड़ा आतंकवाद बनकर डस रहा है,
हर गली,हर गांव,हर शहर में जो चुपके से बस रहा है,
इंसान को इंसान से तोड़ता,जो अंदर ही अंदर खा रहा है,
उस जातिवाद के ज़हर से,उस ऊंच-नीच की सड़ांध से,
वोट बैंक की खातिर रची गई इस घिनौनी बिसात से,
हमें हर हाल में आज़ादी चाहिए,
यह देश किसी एक जाति या धर्म का जागीर नहीं,
मज़लूमों के पैरों में पड़ी रहे,यह वैसी तकदीर नहीं,
जब तक न मिटेगा यह जातिवाद का दानव,
तब तक सच्चा आज़ाद न हो पाएगा कोई मानव,
हां भगत सिंह के सपनों के उस पावन भारत के लिए,
जहाँ जाति,मजहब और रिश्वत की कोई जगह न हो,
उस खुले आसमां में खुलकर सांस लेने के लिए,
हमें अपने ही भीतर छिपे इन दुश्मनों से,
एक और आज़ादी चाहिए,
हां एक और आज़ादी चाहिए।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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