मुक्तक/दोहा

काम नहीं, बस शोर है

काम नहीं, बस एक्ट है, आरोपों की रेट।
एटीएमों-सा खुला, बन बैठा पैकेट।।

काम नहीं, बस शोर है, धारा बनती ढाल।
निर्दोषों को फांसता, कानूनों का जाल।।

धारा लेकर घूमते, जैसे कोई ढाल।
सच पीछे रह गया, आरोपों के जाल।।

न्याय अगर व्यापार हो, कौन रहे निष्पक्ष।
कागज पर ही जीत ले, झूठा भी अब पक्ष।।

कानून बना न्याय को, बन बैठा हथियार।
दुरुपयोग की राह में, कौन करे विचार।।

धारा की बस धमकियाँ, माँगे मोटा दाम।
न्याय कहाँ फिर खोजिए, सौदा बने मुकाम।।

सच बोले तो चुप रहो, झूठ कहे तो शोर।
ऐसी कैसी न्याय की, उलटी पकड़ी डोर।।

कानूनों की आड़ में, चलते अब व्यापार।
न्यायालय की चौखटों, बिकता रोज विचार।।

मुकदमें बना भय दिखा, माँगे जाएँ दाम।
ऐसे काले खेल से, न्याय हुआ बदनाम।।

दोषी को हो दंड पर, निर्दोष न हो शिकार।
न्याय तभी कहलाएगा, दोनों का अधिकार।।

धारा जितनी तेज हो, तभी तेज हो जाँच।
वरना सच के नाम पर, रहे सुलगती आँच।।

आरोपों की ओट में, मत बन सौदेबाज।
कानूनी गरिमा रहे, रखिए थोड़ी लाज।।

कानून अगर ढाल है, ढाल रहे मजबूत।
लेकिन उसके नाम पर, मत बेचो यूँ झूठ।।

सीढ़ी बनते मुकदमें, लगे लगाने मोल।
न्याय व्यवस्था पूछती, सच है कितना बोल।।

कानूनों की धार से, अत्याचार हो दूर।
दुरुपयोग की धार से, निर्दोष न हो चूर।।

धारा का भय थोपकर, मत खोलो बाजार।
कानून न्याय के लिए, नहीं लूट हथियार।।

सच की कीमत शून्य हो, झूठा पाए भाव।
ऐसी हालत देखकर, न्याय करे क्या दाव।।

कानून रहे सत्य सब, ना सौदा सामान।
न्याय बिकाऊ हो गया, तो कैसा फिर मान।।

रक्षा का कानून हो, रक्षा करे समाज।
झूठे आरोपों आड़ में, चले न कोई राज।।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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